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*ज्यों जल मैंणी माछली, तैसा यहु संसार ।*
*माया माते जीव सब, दादू मरत न बार ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*कृपण का अंग १२०*
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आलम१ अंध्रिप२ में द्रसै३, सूम सु सूखी डाल ।
परमारथ शोभा न तरु, सो यम चूल्है बाल४ ॥२१॥
वृक्ष में सूखी डाली दिखती३ है, उससे वृक्ष२ की शोभा नहीं होती, उसे चुल्हे में ही जलाया४ जाता है, वैसे ही संसार१ में कृपण है, उससे परमार्थ की शोभा नहीं होती, वह यम के द्वारा मारा जाता है ।
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रज्जब माया के फल सूम के, कदे न आवे हाथ ।
स्वारथ परमारथ नहीं, तीजे चले न साथ ॥२२॥
कृपण की माया, माया से रचित बाजीगर के फलों के समान है, जैसे वे फल कभी भी हाथ नहीं आते, वैसे ही कृपण का धन न तो स्वार्थ वा परमार्थ में लगता है और न तीसरे साथ ही चलता है ।
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सूम हिं यहां न वहाँ कछु, बात जु बिणठी१ मूल२ ।
रज्जब धन घर३ गाड़ तों, तुरत किया तन धूल ॥२३॥
कृपण को न तो यहाँ सुख है और न वहाँ परलोक में कुछ सुख है । उसके सुख के साधन की बात जड़२ से ही नष्ट१ हो जाती है । वह तो धन को पृथ्वी३ में गाड़ते ही तुरन्त अपने मानव तन को धूल कर डालता है, अर्थात व्यर्थ खो देता है ।
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ज्यों गतराड़ा पय१ पुत्र बिन, त्यों सूम हि सुकृत नाश ।
रज्जब रीते उभय दिशि, निश्चय जाय निराश ॥२४॥
जैसे गतराड़ा नारी का दूध१ पुत्र बिना नष्ट हो जाता है, वैसे ही सुकृत बिना कृपण का धन नष्ट हो जाता है । कृपण स्वार्थ तथा परमार्थ दोनों और से खाली रह जाते हैं और निश्चय पूर्वक निराश होकर अन्य शरीर को जाते हैं ।
(क्रमशः)

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