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*शिर के साटै लीजिये, साहिब जी का नांव ।*
*खेलै शीश उतार कर, दादू मैं बलि जांव ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ शूरातन का अंग)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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(८)
*श्रीरामकृष्ण और गृहस्थधर्म*
साढ़े-पाँच या छः बजे का समय है । श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ अपने कमरे के दक्षिण-पूर्ववाले बरामदे में बैठे हुए हैं । भक्तों को देख रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण(केदार आदि भक्तों से)-जो संसारत्यागी है वह तो ईश्वर का नाम लेगा ही । उसको तो और दूसरा काम ही नहीं । वह यदि ईश्वर का चिन्तन करता है तो उस में आश्चर्य की बात क्या है ! वह यदि ईश्वर की चिन्ता न करे, यदि ईश्वर का नाम न ले, तो लोग उसकी निन्दा करेंगे ।
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“संसारी मनुष्य यदि ईश्वर का नाम जपे, तो समझो उसमें बड़ी मर्दानगी है । देखो, राजा जनक बड़े ही मर्द थे । वे दो तलवारें चलाते थे, एक ज्ञान की और एक कर्म की । एक और पूर्ण ज्ञान था, और दूसरी ओर वे संसार का कर्म कर रहे थे । बदचलन स्त्री घर के सब कामकाज बड़ी खूबी से करती है, परन्तु वह सदा अपने यार की चिन्ता में रहती है ।”
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“साधुसंग की सदा आवश्यकता है । साधु ईश्वर से मिला देते हैं ।”
केदार- जी हाँ, महापुरुष जीवों के उद्धार के लिए आते हैं । जैसे रेलगाड़ी के इंजन के पीछे कितनी ही गाड़ियाँ बँधी रहती हैं, परन्तु वह उन्हें घसीट ले जाता है । अथवा जैसे नदी या तड़ाग कितने ही जीवों की प्यास बुझाते हैं ।
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क्रमशः भक्तगण घर लौटने लगे । सभी ने श्रीरामकृष्ण को भूमिष्ठ प्रणाम किया । भवनाथ को देखकर श्रीरामकृष्ण बोले, “तू आज न जा, तुझ जैसों को देखते ही उद्दीपना हो जाती है ।”
भवनाथ अभी संसारी नहीं हुए । उम्र उन्नीस-बीस होगी । गोरा रंग, सुन्दर देह । ईश्वर के नाम से आँखों में आँसू आ जाते हैं । श्रीरामकृष्ण उन्हें साक्षात् नारायण देखते हैं ।
(क्रमशः)

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