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*माया मंदिर मीच का, तामैं पैठा धाइ ।*
*अंध भया सूझै नहीं, साध कहैं समझाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*कृपण का अंग १२०*
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देखहु कृपण कूप मध्य, माया छाया होय ।
जन रज्जब बेकाम बहु, व्योसावे नहिं कोय ॥२५॥
देखो कृपाण की माया, कूप के मध्य के समान है, कूप की छाया और कृपण की माया दोनों ही व्यर्थ है, उससे कोई भी लाभ नहीं उठा सकता ।
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रे रज्जब रिधि१ सूम की, व्यभिचारी आधान२ ।
धणियों३ काम न आव ही, मन वच कर्म करि मान ॥२६॥
कृपण का धन१ और व्यभिचारी के गर्भाधान२ की संतान उसके स्वामी३ कृपण और व्यभिचारी के काम में नहीं आती, यह बात मन, वचन और कर्म से सत्य समझ करके ही मानना चाहिये ।
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शक्ति१ सदन२ में बाढतों, हर्षे संचक३ हेर४ ।
ज्यों जहाज जल सौं भरै, तब बूड़त क्या बेर ॥२७॥
धन१ घर२ में बढता देख३ कर धन का संग्रहकर्त्ता४ हर्षित होता है जैसे जहाज में जल बढता है तब उसके डूबते क्या देर लगती है, वैसे ही धन संचक को नष्ट होते क्या देर लगती है ।
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शक्ति१ शीत के कोट को, संचक२ देखि सिहाय३ ।
रविसुत४ किरणि न सूझ ही, सुन हि नहीं करि जाय ॥२८॥
जैसे कोई शीत से बने हुये किले को देखकर प्रसन्न३ होता है किन्तु उस किले को नष्ट करने वाली सूर्य की किरण उसे नहीं दीखती, उसको सुनकर भी नहीं सुनी के समान कर जाता है । वैसे ही धन१ का संग्रहकर्ता२ कृपण धन को देखकर प्रसन्न३ होता है किन्तु उसे नष्ट करने वाले सूर्य का पुत्र यमराज४ नहीं दीखता, दूसरों की मृत्यु सुनकर भी नहीं सुनी के समान कर जाता है ।
(क्रमशः)

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