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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*५. परचा कौ अंग ~ ५/८*
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तेज पुंज आकार मंहि, निराकार भरपूर ।
कहि जगजीवन निकट हरि, अनजाने६ अति दूर ॥५॥
(६. अनजाने-अज्ञानी के लिये)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सब तेज उन प्रभु में ही है वे निराकार हैं। वे सदा हमारे पास हैं किंतु अज्ञानी जन समझते हैं वे बहुत दूर हैं।
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तेज पुंज तहां मन रमै, दोइ नैनौं के बीच७ ।
जगजीवन अम्रित झरै, आतम बेली सींच ॥६॥
{७. दोइ नैंनौं के बीच-दो भ्रुवों के मध्य(भ्रूचक्र के मध्य)}
संतजगजीवन जी कहते हैं जहाँ तेजोमय प्रभु का स्वरूप है वहीं मन रमता है । जब ध्यानस्थ होते हैं तो भूचक्र के मध्य में प्रभु छवि ही दिखती है। संत कहते हैं कि वहां से निकले अमृत से आत्मरुप लता सिंचन होता है।
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तेज मुकुट मस्तक८ धरै, सोइ कहावै कांन९ ।
कहि जगजीवन बिरहणी, ए सब गोपी आंन ॥७॥
{८. मसतक-मस्तक(=शिर) पर} {९. कांन-कान्ह(कृष्णभगवान्)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिसके मस्तक पर तेज पुंज का मुकुट दृश्य है, वे ही कृष्ण हैं, बाकी सभी जीवात्मा गोपी जिनकी लगन उनमें लगी है, वे कृष्ण दर्शन को विरहातुर हैं।
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तेज छत्र सिर पर बिराजै, तेज तखत पर रंग ।
कहि जगजीवन तेज का, आप दिया हरि अंग ॥८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिनके मस्तक पर तेज रुपी छत्र विराजता है जो तेज रुपी शैय्या पर ही आनंद बरसाते हैं ऐसे तेजोमय प्रभु ने सब भक्तों को अपना तेज ही कृपा रुप में दिया है।
(क्रमशः)

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