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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १३. साच का अंग)
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*कहे कहे का होत है, कहे न सीझै काम ।*
*कहे कहे का पाइये, जब लग हृदै न आवै राम ॥७१॥*
उनके लिये ज्ञान का व्याख्यान तो सुलभ है किन्तु कर्तव्य का पालन कठिन है । अतः जब तक हृदय में राम भक्ति पैदा नहीं होती तब तक केवल ज्ञान के कथन से ब्रह्म प्राप्ति नहीं हो सकती है ।
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*॥ चौंप(चाह) बिन चौंप चर्चा ॥*
*दादू श्रोता घर नहीं, वक्ता बकै सु बादि ।*
*वक्ता श्रोता एक रस, कथा कहावै आदि ॥७२॥*
*वक्ता श्रोता घर नहीं, कहै सुनै को राम ।*
*दादू यहु मन थिर नहीं, बाद बकै बेकाम ॥७३॥*
जो भगवत्कथा प्रेम से तथा कल्याण की भावना से कही सुनी जाती है उसी से वक्ता और श्रोता को लाभ होता है और जो बिना श्रद्धा और बिना मन कही सुनी जाती है वह तो केवल समय का यापन ही है । क्योंकि वक्ता और श्रोता का मन तो विषयों में दौड़ रहा है । फिर ऐसी कथा का कहना या सुनना बेकार ही है । कथा का कहना और सुनना तो वही है कि जहां वक्ता और श्रोता एक रस में डूब जांय ।
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*॥ विचार दृढज्ञान ॥*
*अन्तर सुरझे समझ कर, फिर न अरूझे जाइ ।*
*बाहर सुरझे देखतां, बहुरि अरूझे आइ ॥७४॥*
जब तक दृढ़ ज्ञान के द्वारा मानसिक विकार नष्ट नहीं होते तब तक बाह्य ज्ञान भी निष्फल ही है । बाह्य ज्ञानियों को विषयों में आसक्त देखा जाता है । अतः सच्चा दृढ़ज्ञान वही है जिससे वासना सर्वथा जलजाय । जिससे फिर संसार की आसक्ति पैदा न हो सके । क्योंकि जो वैराग्यवान् विवेकी और ब्रह्म को नित्य समझने वाला है उसके मन से कभी असत्य पदार्थों में रति नहीं देखी गई ।
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*॥ झूंठै गुरु ॥*
*आतम लावै आप सौं, साहिब सेती नांहि ।*
*दादू को निपजै नहीं, दोन्यूं निष्फल जांहि ॥७५॥*
*तू मुझ को मोटा कहै, हौं तुझ बड़ाई मान ।*
*सांई को समझै नहीं, दादू झूठा ज्ञान ॥७६॥*
कोई गुरु अपने शिष्य को हरि भक्ति से हटाकर केवल अपनी सेवायें ही शिष्य को लगाता रहता है और शिष्य भी उसकी सेवा करता हुआ कभी हरि को नहीं भजता और जनता में अपने गुरु की मिथ्या प्रशंसा करता रहता है कि मेरा गुरु तो पूर्ण ज्ञानी है । गुरु भी अपने शिष्य की झूठी प्रशंसा करता है । ऐसे गुरु और शिष्य दोनों ही प्रभु को न जानकर संसार में ही आसक्त रहते हैं । अतः उन दोनों का ज्ञान के बिना संसार में ही पतन होगा ।
(क्रमशः)

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