शुक्रवार, 5 जून 2020

*५. परचा कौ अंग ~ ९/१२*

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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*५. परचा कौ अंग ~ ९/१२*
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तेज पुंज कै अंग मंहि, हंस रहै कर वास ।
सोइ तेज का अंग कहावै, सु कहि जगजीवनदास ॥९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं, जहाँ तेज का ओज या मण्डल मन में रहता हो वहां ही प्रभु सशरीर निवास करते हैं। और फिर अपनी निर्बाध भक्ति प्रदान करते हैं।
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तेज पुंज उर मंहि बसै, वपु तहां कीन्ह निवास ।
भगति अखंडित एक रस, सु कहि जगजीवनदास ॥१०॥ 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि तेजोमय प्रभु के साथ संत रूपी हंस वास करते हैं, और ऐसी स्थिति ही परम तेजोमय होती है, जहाँ प्रभु व संत दोनों मिलते हैं।
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तेज भरै तेज ही झरै, तेज धरै उर मांहि ।
कहि जगजीवन तेज१ का, ऊपजै बिनसै नांहि१ ॥११॥
(१-१. तेजः सम्पन्न साधक का उत्पाद एवं विनाश नहीं हुआ करता)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु प्रभा का आना, जाना व हृदय में रहना यह बताता है कि तेज सम्पन्न साधक सदा रहते हैं वे उत्पत्ति प्रलय से परे होते है।
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कै लख चंदा झिलमिलै, कै लख सूरज तेज ।
कै लख दीपक जोइया, अकल पुरिष२ की सेज ॥१२॥
(२. अकल पुरिष-अविनाशी परमात्मा)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कितने ही लाख चंद्र चमके, कितने ही सूरज प्रकाशित हों, कितने ही लाख दीपक प्रज्वलित होते हैं, उन परम प्रभु की सेवा शैय्या पर, ऐसे तेजोमय परमात्मा हैं।
(क्रमशः)

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