सोमवार, 1 जून 2020

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*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द* 
*राग नट नारायण १८(गायन समय रात्रि ९ से १२)* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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२९१ - हितोपदेश । गजताल
ताको काहे न प्राण संभालै ।
कोटि अपराध कल्प के लागे, माँहिं महूरत टालै ॥टेक॥
अनेक जन्म के बन्धन बाढ़े, बिन पावक फंद जालै ।
ऐसो है मन नाम हरी को, कबहूं दु:ख न सालै ॥१॥
चिन्तामणि जुगति सों राखै, ज्यों जननी सुत पालै ।
दादू देखु दया करै ऐसी, जन को जाल न रालै१ ॥२॥
हितकर उपदेश कर रहे हैं - अरे प्राणी ! जो कल्प(ब्रह्मा का एक दिन) भर के हृदय में लगे हुये पापों को एक मुहुर्त्त(४८ मिनट वो १ क्षण) में हटा लेते हैं, उन प्रभु का स्मरण क्यों नहीं करता ? 
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वे अनेक जन्मों के कर्म बन्धनों को काट डालते हैं, बिना अग्नि ही भक्तों के फँद को जला देते हैं । अरे ! तू अपने मन में सोच तो सही, उन हरि का नाम ऐसा शक्तिशाली है कि - स्मरण करने वाले को कोई भी प्रकार का दु:ख व्यथित नहीं करता । 
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जैसे माता अपने पुत्र का पालन करती है, वैसे ही युक्ति से चिन्तामणि रूप हरि अपने भक्तों की रक्षा करते हैं । अरे ! देख तो सही, वे ऐसी दया करते हैं कि - उनके भक्त को यमदूत अपने जाल में नहीं डाल१ सकते ।
(क्रमशः)

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