गुरुवार, 4 जून 2020

= *कृपण का अंग १२०(३३/३७)* =

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*बिना भुवंगम हम डसे, बिन जल डूबे जाइ ।*
*बिन ही पावक ज्यों जले, दादू कुछ न बसाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*कृपण का अंग १२०*
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रज्जब माया बेलड़ी, सीच्यों दो फल देत ।
मूवाँ पीछे जीव को, सर्प करे कै१ प्रेत ॥३३॥
जैसे बेली सीचने से फल देती है, वैसे ही माया भी केवल संग्रह करने से कृपण जीव को दो फल देती है । मरे पिछे सर्प और१ प्रेत बनाती है ।
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कृपण कंचन धन धर्या, हस्त न लावे हेर१ ।
तो रज्जब सुन सखी२ ने, संच्या३ सोवन मेर ॥३४॥
देख१ कृपण ने सुवर्ण आदि धन संग्रह करके धरा है खर्चने के लिये उसके हाध भी नहीं लगाता किन्त सुन, दानी२ कर्ण ने तो सुवर्ण का पर्वत संग्रह३ कर लिया था, अत: संग्रह करने में भी दानी ही श्रेष्ठ है ।
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रज्जब आये काल, सुकृत सामे१ बिन चले ।
सूम सदा बेहाल२, भूखे चौरासी डुले३ ॥३५॥
काल आने पर कृपण सुकृत रूप सामान१ के बिना ही जाता है । अत: उसका बुरा२ हाल होता है और वह भूख के मारे चौरासी लाख योनियों में भ्रमण३ करता है ।
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रज्जब काढे१ कूप जल, घटे न निर्मल नीर ।
बिन काढ्यां२ पाणी सिड़ै३, पीवे न कोई वीर४ ॥३६॥
हे भाई४ ! कूप से जल निकालने१ पर जल कम नहीं होता, निर्मल रहता है, नहीं काढने२ से जल गंदा३ हो जाता है, उसे कोई भी नहीं पीता । जैसे ही धन धर्म में खर्चते रहने से अच्छा रहता है, नहीं खर्चने से खराब हो जाता है ।
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सूम१ विछोह२ शिव रु शक्ति, इहिं दुख को सहि दोय ।
रज्जब सिद्धि३ सराप जिहिं, सो ब सर्प किन होय ॥३७॥
कृपण१ माया को सुकृत द्वारा ईश्वर के समर्पण नहीं करता, अत: शिव और शक्ति को अलग अलग२ रखता है इस दुख को शिव और शक्ति दोनों ही सहन करते हैं, उससे माया३ रुष्ट होकर कृपण को शाप देती है, जिसे माया शाप दे, वह क्यों नहीं सर्प होगा ?
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित कृपण का अंग १२० समाप्तः ॥सा. ३६७७॥
(क्रमशः)

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