सोमवार, 1 जून 2020

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*दादू करबे वाले हम नहीं, कहबे को हम शूर ।*
*कहबा हम थैं निकट है, करबा हम थैं दूर ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ साँच का अंग)*
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साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु*, *कीर्तन भक्ति*
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एक कथावाचक कथा के समय बैंगन के दोषों को दिखते हुये बोले - बैंगन कभी नहीं खाने चाहिये । बैंगन खाने से पुण्य नष्ट हो जाते हैं और प्राणी स्वर्ग में नहीं जा सकता ।'
पंडित की स्त्री भी कथा सुन रही थी, गत दिन पंडित ने उसे बैंगन ही लाकर दिये थे । उसने घर आकर बैंगन फेंक दिये और दाल बना ली ।
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पंडित जब भोजन करने बैठा तब बोला - 'बैंगन नहीं बनाये क्या ?"
स्त्री - "बैंगन का तो आज आपने कथा में बहुत निषेध किया था इससे मैंने तो फैंक दिये ।"
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पंडित - "अरी पगली ! कथा की बात दुसरों के लिये है, हमारे लिये नहीं है । हम तो अपनी जीविका के लिये कथा करते हैं । हाथी के रद(दांत) बाहर दिखते हैं वह उनसे तो नहीं खाता, उसके खाने के दूसरे ही होते हैं । वैसे ही हमारी कहने की बात दूसरी होती है और करने की दूसरी होती है । तुम तो कोमल - कोमल बैंगन का शाक प्रति दिन बनाया करो, अपने को कोई दोष नहीं लगता ।
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कहा भी है -
कथा यथा शुक्रदेव की भया परीक्षित पार ।
रे रज्जब करनी बिना, कर आओ रुजगार ।'
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इससे सूचित होता है कि जीविका निमित्त कथा करने से श्रेष्ठ(मुक्ति रूप) लाभ नहीं होता ।
कथा जीविका हित करे, श्रेष्ठ लाभ नहिं पात ।
करि रद खाने के अपर, बाहर अन्य दिखात ॥६१॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^

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