मंगलवार, 2 जून 2020

= २९२ =

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*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द* 
*राग नट नारायण १८(गायन समय रात्रि ९ से १२)* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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२९२ - विरह । जयमँगल ताल
https://youtu.be/GoJigDPjSzM
गोविन्द ! कबहुँ मिलै पीव मेरा ?
चरण - कमल क्यों हीं कर देखूँ, 
राखूँ नैनहुं नेरा ॥ टेक ॥
निरखण का मोहि चाव घणेरा, 
कब मुख देखूँ तेरा?
प्राण मिलन को भयी उदासी, 
मिल तूँ मीत सवेरा ॥ १ ॥
व्याकुल तातैं भई तन देही, 
शिर पर जम का हेरा ।
दादू रे जन राम मिलन को, 
तपई तन बहुतेरा ॥ २ ॥
२९२ - २९४ में विरह दिखा रहे हैं - मेरे प्रियतम गोविन्द ! आप मुझे कब मिलेंगे ? किस प्रकार मैं आपके चरण - कमलों को देख कर उन्हें अपने नेत्रों के समीप रख सकूंगा ? 
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मुझे आपका मुख देखने का बड़ा उत्साह है किन्तु पता नहीं कब देख सकूंगा ? आप से मिलने के लिये मेरा मन दु:खी हो रहा है । मेरे सिर पर यम का हमला भी हो रहा है । 
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इससे स्थूल शरीर में स्थित जीवात्मा व्याकुल हो रहा है । अरे ! मुझ भक्त का तन राम से मिलने के लिये बहुत प्रकार से सँतप्त रहता है । अत: हे मित्र ! शीघ्र ही मुझ से मिलो ।
(क्रमशः)

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