मंगलवार, 2 जून 2020

*१५५. महाप्रभु की अलौकिक क्षमा*

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*दादू जिहिं विधि आतम उद्धरै, परसे प्रीतम प्राण ।*
*साधु शब्द क्यूँ निंदणां, समझैं चतुर सुजाण ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ निंदा का अंग)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१५५. महाप्रभु की अलौकिक क्षमा*
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क्षमा बलमशक्तानां शक्तानां भूषणं क्षमा।
क्षमा वशीकृतिर्लो के क्षमया किं न सिद्ध्यति॥[१]
([१] निर्बल पुरुषों का बल क्षमा ही है और वही क्षमा बलवानों का परम भूषण है। क्षमा के द्वारा संसार वश में किया जा सकता है। संसार में ऐसा कौन-सा काम है, जो क्षमा के द्वारा सिद्ध न हो सकता हो? सु. र. भां. ८७/३)
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महापुरुषों के पास भिन्न भिन्न प्रकृति के भक्त होते हैं। बहुत से तो ऐसे होते हैं, जो उनके गुण अवगुण को समझते नहीं, उनके लिये वे जो भी कुछ करते हैं सब अच्छा ही करते हैं। महापुरुषों के कार्यों में उन्हें अनौचित्य दीखता ही नहीं। बहुत से ऐसे होते हैं, जो गुण दोषों का विवेचन तो कर लेते हैं, किन्तु महापुरुषों के दोषों के ऊपर ध्यान नहीं देते, वे अवगुणों की उपेक्षा करके गुणों को ही ग्रहण करते हैं।
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कुछ ऐसे होते हैं, हृदय से उनके गुणों के प्रति तो श्रद्धा के भाव रखते हैं, किन्तु जहाँ उन्हें कोई मर्यादा के विरुद्ध कार्य करते देखते हैं वहाँ उनकी आलोचना भी करते हैं और उन्हें उस दोष से पृथक रखने के लिये प्रयत्नशील भी होते हैं। कुछ ऐसे भी भक्त या कुभक्त होते हैं जो महापुरुषों के प्रभाव को देखकर मन ही मन डाह करते हैं और उनके कामों में सदा छिद्रान्वेषण ही करते रहते हैं।
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उपर्युक्त तीन प्रकार के भक्त तो महापुरुषों से यथाशक्ति लाभ उठाते हैं, किन्तु ये चौथे निन्दक महाशय अपना नाश करके महापुरुष का कल्याण करते हैं, अपनी नीचता के द्वारा महापुरुषों की सदवृत्तियों को उभारकर उन्हें लोगों के सम्मुख रखते हैं। उनके बराबर परोपकारी संसार में कौन हो सकता है, जो अपना सर्वस्व नाश करके लोक कल्याण के निमित्त महापुरुषों के द्वारा क्षमा और सहनशीलता का आदर्श उपस्थित कराते हैं।
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महाप्रभु के दरबार में पहले और दूसरे प्रकार के भक्तो की संख्या ही अधिक थी। प्रायः उनके सभी भक्त उन्हें ‘सचल जगन्नाथ’ ‘संन्यास वेषधारी पुरुषोत्तम’ मानकर भगवदबुद्धि से उनकी सेवा पूजा किया करते थे, किन्तु आलोचक और निन्दकों का एकदम अभाव ही हो, सो बात नहीं थी। उनके बहुत से आलोचक भी थे, किन्तु प्रभु उनकी बातें ही नहीं सुनते थे। कोई भूल में आकर उनसे कह भी देता, तो वे उसे उस बात के सुनाने से एकदम रोक देते थे।
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यह तो बाहर के लोगों की बात रही, उनके अंतरंग भक्तों तथा साथियों में भी ऐसे थे, जो खरी कहने के लिये प्रभु के सामने भी नहीं चूकते थे, किंतु उनका भाव शुद्ध था। एक त्यागाभिमानी रामचन्द्रपुरी नाम के उनके घोर निन्दक संन्यासी भी थे, किन्तु प्रभु की अलौकिक क्षमा के सामने उन्हें अन्त में पुरी को ही छोड़कर जाना पड़ा। पहले दामोदर पण्डित की आलोचना की एक घटना सुनिये।
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महाप्रभु श्री मन्दिर के समीप ही रहते थे। वहीं कहीं पास में ही एक उड़िया ब्राह्मणी का घर था। वह ब्राह्मणी विधवा थी, उसका एक तेरह-चौदह वर्ष का लड़का प्रभु के पास आया करता था। उस लड़के का सौन्दर्य अपूर्व ही था। उसके शरीर का रंग तप्त कांचन के समान बड़ा ही सुन्दर था, अंग प्रत्यंग सभी सुडौल-सुन्दर थे। शरीर में स्वाभाविक बालचापल्य था। अपनी दोनों बड़ी बड़ी सुहावनी आँखें से वह जिस पुरुष की भी ओर देख लेता वही उसे प्यार करने लगता।
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वह प्रभु को प्रणाम करने के लिये नित्य प्रति आता। प्रभु उससे अत्यधिक स्नेह करने लगे। उसे बिठाकर उससे प्रेम की मीठी मीठी बातें पूछते, कभी कभी उसे प्रसाद भी दे देते। बच्चों का हृदय तो बड़ा ही सरल और सरस होता है, उनसे जो भी प्रेम से बोले वे उसी के हो जाते हैं। प्रभु के प्रेम के कारण उस बच्चे का ऐसा हाल हो गया कि उसे प्रभु के दर्शनों के बिना चैन ही नहीं पड़ता था।
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दिन में दो दो, तीन तीन बार वह प्रभु के पास आने लगा। दामोदर पण्डित प्रभु के पास ही रहते थे। उन्हें उस अद्वितीय रूप लावण्ययुक्त अल्पवयस्क बच्चे का प्रभु के पास इस प्रकार से आना बहुत ही बुरा लगने लगा। वे एकान्त में बच्चे को डाँट भी देते और उसे यहाँ आने का निषेध भी कर देते, किन्तु हृदय का सच्चा प्रेम किसकी परवाह करता है।
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अत्यन्त प्रेम मनुष्यों को ढीठ बना देता हैै बिना किसी की बात सुने निर्भय होकर प्रभु के पास चला जाता और घंटों उनके पास बैठा रहता। प्रभु बाल भाव में उससे भाँति-भाँति की बातें किया करते। मनुष्य के स्वभाव में एक प्रकार की क्रूरता होती है। जब हम किसी पर अपना पूर्ण अधिकार समझते हैं और उसी पर अपना पूर्ण अधिकार समझनेवाला कोई दूसरा पुरुष भी हो जाता है तो हम मन ही मन उससे डाह करने लगते हैं, फिर चाहे वह कितना भी सर्वगुणसम्पन्न क्यों न हो, हमें वह राक्षस सा प्रतीत होता है।
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दामोदर पण्डित का भी यही हाल था। उन्हें उस विधवा के सुन्दर पुत्र की सूरत से घृणा थी, उसके नाम से चिढ़ थी, उसे देखते ही वे जल उठते। एक दिन उन्होंने उस लड़के को प्रभु के पास बैठा देखा। प्रभु उससे हँस-हँस कर बातें कर रहे थे। उस समय तो उन्होंने प्रभु से कुछ नहीं कहा। जब वह लड़का उठकर चला गया तो उन्होंने कुछ प्रेम पूर्वक रोष के स्वर में कहा- ‘प्रभो ! आप दूसरों को ही उपदेश देने के लिये हैं, अपने लिये नहीं सोचते कि हमारे आचरण को देखकर कोई क्या समझेगा?
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प्रभु ने सम्भ्रम के साथ कहा- ‘क्यों, क्यों, पण्डित जी ! मैंने ऐसा कौन सा पापकर्म कर डाला?’ उसी प्रकार रोष के साथ दामोदर पण्डित ने कहा- ‘मुझे इस लड़के का आपके पास इस प्रकार निस्संकोच भाव से आना अच्छा प्रतीत नहीं होता। आपको पता नहीं, लोग मन में क्या सोचेंगे? संसारी लोग विचित्र होते हैं, अभी तो सब गुसाईं-गुसाईं कहते हैं। आपके इस आचरण से सभी आपकी निन्दा करने लगेंगे और तब सब ईश्वरपना भूल जायँगे।’
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प्रभु ने सरलता पूर्वक कहा- ‘दामोदर ! इस लड़के में तो मुझे कोई भी दोष नहीं दीखता; बड़ा सरल, भोला-भाला और गौ के बछड़े के समान सीधा है।’ दामोदर पण्डित ने कहा- ‘आपको पता नहीं यह विधवा का पुत्र है, इसकी माता अभी युवती है, वैसे वह बड़ी तपस्विनी, सदाचारिणी तथा भगवत्परायणा है, फिर भी उसमें तीन दोष हैं।
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वह युवती है, अत्यधिक सुन्दरी है और विधवा है तथा अपने घर में अकेली ही है, आप अभी युवक हैं, अद्वितीय रूप लावण्ययुक्त हैं। हम तो आपके मनोभावों को समझते हैं, किन्तु लोक किसी को नहीं छोड़ता। वह जरा सा छिद्र पाते ही निन्दा करने लगता है। लोगों के मुखों को हम थोड़े पकड़ लेंगे। इतने दिन की जमी हुई प्रतिष्ठा सभी धूल में मिल जायगी।’
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दामोदर पण्डित की बातों से प्रभु को हृदय में सन्तोष हुआ कि इन्हें मेंरी पवित्रता का इतना अधिक ध्यान रहता है, किन्तु उनके भोलेपन पर उन्हें हँसी भी आयी। उस समय तो उन्होंने उनसे कुछ भी नहीं कहा। दूसरे दिन एकान्त मे बुलाकर कहने लगे- ‘दामोदर पण्डित ! मैं समझता हूँ, तुम्हारा नवद्वीप में ही रहना ठीक होगा, वहाँ तुम्हारे भय से भक्तवृन्द मर्यादा के विरुद्ध आचरण न कर सकेंगे और तुम माता जी की भी देख-रेख करते रहोगे। वहीं जाकर माता के समीप रहो और बीच में मुझे देखने के लिये यहाँ आ जाया करना।
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माता जी के चरणों में मेरा प्रणाम कहना और उन्हें समझा देना कि मैं सदा उनके बनाये हुए व्यंजनों को खाने के लिये नवद्वीप में आता हूँ और प्रत्यक्षरीति से भगवान के भोग लगाये हुए नैवेद्य को पाता हूँ।’ इतना कहकर और जगन्नाथ जी का प्रसाद देकर उन्हें नवद्वीप को विदा किया। वे नवद्वीप में आकर शचीमाता के समीप रहने लगे, उनके भय से नवद्वीप के भक्त कोई भी मर्यादा के विरुद्ध कार्य नहीं करते थे। इनकी आलोचना बड़ी ही खरी तथा तीव्र होती थी।
(क्रमशः)

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