मंगलवार, 2 जून 2020

*१५६. निन्दक के प्रति भी सम्मान के भाव*


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*दादू निंदक बपुरा जनि मरै, पर उपकारी सोइ ।*
*हम को करता ऊजला, आपण मैला होइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ निंदा का अंग)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१५६. निन्दक के प्रति भी सम्मान के भाव*
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महात्मा दादू दयाल जी ने निन्दा करने वाले को अपना पीर-गुरु बताकर उसकी खूब स्तुति की। जिन पाठशालाओं में परीक्षक होते हैं और वे सदा परीक्षा ही लेते रहते हैं, उसी प्रकार इन निन्दकों को भी समझना चाहिये। परीक्षक उन्हीं छात्रों की परीक्षा करते हैं, जो विद्वान बनने की इच्छा से पाठशाला में प्रवेश करते हैं।
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जो बालक पढ़ता ही नहीं, जो जानवरों की तरह पैदा होते ही खाने-पीने की चिन्ता में लग जाता है उसकी परीक्षक परीक्षा ही क्या करेगा? वह तो निरक्षरता की परीक्षा में पहले ही उत्तीर्ण हो चुका है। इसी प्रकार निन्दक लोग उसी की निन्दा करते हैं जो इहलौकिक तथा पारलौकिक उन्नति करना चाहते हैं, जो श्रेष्ठ बनने की इच्छा से उन्नति की पाठशाला में प्रवेश करते हैं।
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जिसके जीवन में कोई विशेषता ही नहीं, जो आहार, निद्रा, भय और मैथुनादि धर्मों में अन्य प्राणियों के समान व्यवहार करता है उसकी निन्दा स्तुति दोनों समान हैं। इहलौकिक उन्नति में निन्दा चाहे कुछ विघ्न भी कर सके, किन्तु पारलौकिक उन्नति में तो निन्दा सहायता ही करती हैं।
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निन्दा के दो भेद हैं- एक तो अपवाद, दूसरा प्रवाद। बुरे काम करने पर जो निन्दा होती है उसे अपवाद कहते हैं। उससे बचने की सभी को जी जान से कोशिश करनी चाहिये, किंतु कोई निन्दित कर्म किया तो है नहीं और वैसे ही लोग डाह से, द्वेष से या भ्रम से निन्दा करने लगे हैं उसे प्रवाद कहते हैं। उन्नति के पथ की ओर अग्रसर होने वाले व्यक्ति को प्रवाद की परवाह नहीं करनी चाहिये।
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प्रवाद ही उन्नति के कण्टकाकीर्ण शिखर पर चढ़ाने के लिये सहारे की लाठी का काम देता है। जो लोकरंजन के लिये प्रवाद की परवाह करके उसकी असथार्थता लोगों पर प्रकट करते हैं वे तो ईश्वर हैं। ईश्वरों के तो वचनों को ही सत्य मानना चाहिये, उनके आचरणों की सर्वत्र नकल न करनी चाहिये। धोबी के प्रवाद पर निष्कलंक और पतिपरायणा सती-साध्वी जगन्माता सीता जी को श्री रामचन्द्र जी ने त्याग दिया।
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लोगों के दोष लगाने पर भगवान स्यमन्तकमणि को ढूँढते-ढूँढते परेशान हो गये। ये कार्य उन्हीं अवतारी पुरुषों को शोभा देते हैं । हम साधारण कोटि के जीव यदि इस प्रकार के प्रवादों की परवाह करें तब तो हम लोगों को पैर रखने की जगह भी न मिलेगी, क्योंकि जगत प्रवाद प्रिय है, इसे दूसरों की झूठी निन्दा करने में मज़ा मिलता है। ऐसे ही एक निन्दक महाशय स्वामी रामचन्द्रपुरी प्रभु के समीप कुछ काल रहे थे, उनका वृत्तान्त सुनिये।
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भगवान माधवेन्द्रपुरी श्रीशंकराचार्य के दस नामी संन्यासियों में होने पर भी भक्तिभाव के उपासक थे। वे व्रजविहारी को ही सविशेष, निर्विशेष, साकार-निराकार तथा देशकाल और कार्यकारण से पृथक सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म समझते थे। वे निर्विशेष ब्रह्म की निन्दा करते थे।
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उनका कथन था- ‘भाई ! जिन्हें निर्गुण निर्विशेष ब्रह्म के ध्यान में आनन्द आता हो, वे भले ही ध्यान और अभ्यास के द्वारा उस निराकार ब्रह्म का ध्यान करें, किन्तु हमारा मन तो उस यमुना के पुलिनों पर गौओं के पीछे दौड़ने वाले किसी श्याम रंग के छोकरे ने हर लिया है। हमारी आँखों में तो वही गड़ गया है। उसके सिवा हमें दूसरा रूप भाता ही नहीं, विश्व हमें नीला-ही-नीला दीखता है।[1]
ध्यानाभ्यासवशीकृतेन मनसा यन्निर्गुणं निष्क्रियं
ज्योतिः किंचन योगिनी यदि परं परं पश्यन्तु ते।
अस्मांक तु तदेव लोचनचमात्काराय भूयाच्चिरं
कालिन्दीपुलिनेषु यात्किमपि तन्नीलं महो धावति॥
मधुसूदनस्वामिनः
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ये रामचन्द्रपुरी जी भी उन्हीं भगवान माधवेन्द्रपुरी के शिष्य थे। उनके शिष्यों में परमानन्दपुरी, रंगपुरी, रामचन्द्रपुरी और ईश्वरपुरी आदि के नाम मिलते हैं। इन सबमें शिवपुरी ही अपने गुरु में अत्यधिक श्रद्धा रखते थे और उनकी छोटी-से-छोटी सेवा अपने ही हाथों से करते थे, इसीलिये इन पर गुरु महाराज का प्रसाद सबसे अधिक हुआ और उसी के फलस्वरूप इन्हें गौरांग महाप्रभु के मंत्र दीक्षा गुरु होने का लोकविख्यात पद प्राप्त हो सका।
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ये रामचन्द्रपुरी महाशय पहले से ही सूखी तबीयत के और गुरु निन्दक थे। जब भगवान माधवेन्द्रपुरी का अन्तिम समय आया और वे इस नश्वर शरीर को परित्याग करके गोलोक को गमन करने लगे तब श्रीकृष्ण विरह में छटपटाते हुए रुदन करने लगे।
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रोते-रोते वे विकलता के साथ साँस भर भर कर वेदना के स्वर में कहते- ‘हे नाथ ! तुम्हें कब देख सकूँगा, मथुरा में जाकर आपके दर्शन न कर सका। हे मेरे मनमोहन ! इस अधम को भी उबारो, मैं आपके विरहजन्य दुःख से जला जा रहा हूँ !’ उनकी इस पीड़ा को, विकलता को, कातरता और अधीरता को कोई सच्चा भगवत रसिक ही समझ सकता था। शुष्क तबीयत के; अखण्ड प्रकृति के, ज्ञानाभ्यासी रामचन्द्रपुरी इस व्यथा का मर्म क्या जानें।
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उन्होंने वे ही सुनी हुई ज्ञान की बातें छाँटनी शुरू कर दीं। उन शिक्षकमानी महात्मा को यह भी ध्यान नहीं रहा कि जिन महापुरुष से हमने दीक्षा ली है वे भी इन बातों को जानते होंगे। वे गुरु जी को उपदेश करने लगे- ‘महाराज ! आप ये कैसी मोह की सी भूली-भूली बातें कर रहे हैं, यह हृदय ही मथुरा है, आप ही ब्रह्म हैं, जगत त्रिकाल में भी नहीं हुआ। आप इस शोक को दूर कीजिये और अपने को ही ब्रह्म अनुभव कीजिये।’
(क्रमशः)

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