गुरुवार, 4 जून 2020

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*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द* 
*राग नट नारायण १८(गायन समय रात्रि ९ से १२)* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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२९४ - राज मृँगाक ताल बसँत में
नीके मोहन सौं प्रीति लाई ।
तन मन प्राण देत बजाई, रँग रस के बनाई ॥टेक॥
ये ही जीयरे वे ही पीवरे, छोड्यो न जाई, माई ।
बाण भेद के देत लगाई, देखत ही मुरझाई ॥१॥
निर्मल नेह पिया सौं लागो, रती न राखी काई ।
दादू रे तिल में तन जावे, संग न छाडूं माई ॥२॥
अब तो हमने अच्छी प्रकार मोहन से प्रीति कर ली है । हृदय पर प्रेम रस का अच्छा रँग बनाकर ढोल बजाते हुये अपना तन और प्राण उनको समर्पण कर रहे हैं । 
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हे माई ! वे ही हमारे प्रियतम हैं, यह जीवन उन्हीं का है, उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता । वे वियोग के बाण लगा सकते हैं, तब देखते २ ही हमारा हृदय - कमल कुम्हला जाता है । 
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अब तो प्रियतम से निर्मल स्नेह हो गया है, रत्ती मात्र भी कपट रूप मैल नहीं रहा है । अरी माई ! अब हम उनका संग कभी भी नहीं छोड़ सकते, कारण, यह शरीर तो पल भर में जाने वाला है ।
(क्रमशः)

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