रविवार, 23 अगस्त 2020

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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग सूहा २२(गायन समय दिन ९ से १२)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३५४ - **विनती ।** एकताल
तुम बिच अंतर जनि१ परै माधव, 
भावै तन धन लेहु ।
भावै स्वर्ग नरक रसातल, 
भावै करवत देहु ॥टेक॥
भावै विपति देहु दुख सँकट, 
भावै सँपति सुख शरीर ।
भावै घर वन राव रँक कर, 
भावै सागर तीर, माधवे ॥१॥
भावै बन्ध मुक्त कर माधव, 
भावै त्रिभुवन सार ।
भावै सकल दोष धर माधव, 
भावै सकल निवार, माधवे ॥२॥
भावै धरणि गगन धर माधव, 
भावै शीतल सूर ।
दादू निकट सदा संग माधव, 
तू जनि होवै दूर, माधवे ॥३॥
हे माधव ! चाहे आप हमारा तन धनादि सर्वस्व ले लें किन्तु आपके और मेरे बीच में कोई अन्तराय नहीं१ पड़ना चाहिए, मुझे आपके दर्शन सदा होते रहने चाहिए । चाहे मुझे स्वर्ग, नरक या रसातल में भेज दें, शिर पर करवत चला दें, 
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चाहे विपत्ति में डाल दें, शारीरिक दु:ख दें, मानसिक सँकट दें । चाहे सँपत्ति और शारीरिक सुख दे, घर वो वन में रक्खें, राजा वो रँक कर दें । चाहे सागर तीर रक्खें, 
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बन्धन में डाल दें, मुक्त कर दें, त्रिभुवन की सारी वस्तुयें प्रदान कर दें । चाहे सब दोष मुझ पर डाल दें, वो सम्पूर्ण दोष दूर कर दें । 
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चाहे पृथ्वी में रखें वो आकाश में धर दें । चाहे शीतल बना दें वो सूर्य समान उएण बना दें । हे माधव ! चाहे आप कुछ भी कर दें किन्तु सदा आप मेरे निकट रहते हुये मुझे अपने संग रखिये । कभी भी आप दूर न हों, यही मेरी विनय है ।
(क्रमशः)

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