🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*५. परचा कौ अंग ~ ३२१/२४*
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कहि जगजीवन सुंदरी, सेज रमै सुख पाइ ।
रोम रोम बिगसै मगन, एही प्रेम की चाहि ॥३२१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि आत्मा सुन्दरी राम के संग ही सच्चा सुख अनुभव करती है । उसका रोम रोम पुलकित होता है. यही प्रेम चाहती है कि सराबोर रहे ।
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सेवग हरि सौं मिल रहै, सहज भगति ल्यौ लाइ ।
कहि जगजीवन रांमजी, अम्रित पावै ताहि ॥३२२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सेवक प्रभु से मिले है । सहज भक्ति से लगन लगाकर संत कहते हैं कि यही अमृम पान कहलाता है ।
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तेज पुंज थैं तेज की, रांमति७ बूझी रांम ।
कहि जगजीवन सहज ग्रहै, सुंनि विलै करि धांम ॥३२३॥
{७. रांमति - धर्मोपदेश आदि के लिये घूमना(=चारिका)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु से जब उनकी प्रभा का विस्तार पूछा तो उन्होंने उसे शून्य में समाना बताया ।
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कहि जगजीवन तेज के, तेज निरखि है रांम ।
तेज समावै तेज मंहि, कोइ गति जांनै जांन ॥३२४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि तेज के तेज को राम देखते हैं अर्थात तेजोमय जन की प्रभा को प्रभु देखते हैं वह तेज तेज में ही समा जाता है । इस बात को कोई विज्ञ जन ही जान पाते हैं ।
(क्रमशः)

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