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*दादू कहै सतगुरु शब्द सुनाइ करि,*
*भावै जीव जगाइ ।*
*भावै अन्तरि आप कहि, अपने अंग लगाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*दोहा-नमो परम गुरु शुद्ध कर, तिमिर अज्ञान मिटाय ।*
*आदि अजन्मा पुरुष को, किहिं विधि नर दरशाय ॥२॥*
हे परम गुरो ! मैं आपको नमस्कार करके प्रार्थना करता हूँ- मेरे अन्तःकरण को शुद्ध करके तथा हृदय का अज्ञान रूप अन्धकार मिटाकर के बताइये, विश्व के आदि, अजन्मा, पुरुषोत्तम परमात्मा का दर्शन प्राणी को किस प्रकार हो सकता है ?
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*नर पद सुरपद इन्द्रपद, पुनि हि मोक्षपद मूर१ ।*
*सद्गुरु सो दिव दृष्टि दो, अन्तर भासे नूर२ ॥३॥*
हे सद्गुरो ! नर शरीर, देव शरीर, इन्द्र शरीर और मोक्ष पद का मूल१ कारण क्या है? अर्थात् उक्त सब किन किन साधनों से प्राप्त होते हैं, उनका मुझे यथार्थ ज्ञान हो जाय और मेरे अन्तःकरण के भीतर ही परमात्मा का स्वरूप प्रकाश२ भासने लगे, ऐसी जो दिव्य दृष्टि रूप ज्ञान है वही मुझे प्रदान करने की कृपा करें ।
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*कहत परमगुरु प्रसन्न हो, दियो परमधन दाखि१ ।*
*भक्त भक्ति भगवंत गुरु, राघव ये उर राखि ॥४॥*
उक्त दोहे में किये गये प्रश्न का उत्तर देने में प्रवृत्त होते हुए परम गुरुदेव ने प्रसन्न होकर अपने मतानुसार परम धन मुझे बता१ दिया और कहा हे राघवदास ! भक्त चरित्रों का कथन, भक्ति का निरूपण, भगवान् के नाम तथा गुणों का गायन और गुरुदेव का यशोगान ही परम धन है, इसी को तुम अपने हृदय में धारण करो, ये सब भक्तमाल में आ जाते हैं, अतः भक्तमाल लिखो । इस साधन से ही तुम्हें नर पद आदि के मूल कारण का ज्ञान हो जायेगा तथा आत्मज्ञान रूप दिव्य दृष्टि होकर अन्तःकरण में स्थित परमात्मा का स्वरूप प्रकाश भासने लगेगा । परमगुरुदेव की उक्त आज्ञा मानकर भक्तमाल लिखने में प्रवृत्त हुये प्रथम गुरु पादुका आदि को प्रणाम कर रहे हैं ।
(क्रमशः)

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