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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“तृतीयोल्लास” २८/३०)*
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*संत केदार देस में*
निकसे दोउ किने नहीं जांनां, आरणि(वन) मांहि कियो विश्राम ।
चौकीदार सुधि नहीं पाई, ऐसे संत लंघे सुखदाई ॥२८॥
भगवत कृपा से दोनों संत उस चौकी से पार हो गये और किसी भी चौकीदार को कुछ भी ज्ञान नहीं हुआ और वन में जाकर वे वहां विश्राम करने लगे । योग शक्ति द्वारा सुख के साथ संत चौकी पार कर गये ॥२८॥
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*पंडित जी ने कहा संत आ गये*
रैणि अंधेरी, अरिण(अरण्य) पसारू, कीजै तहां हरिनाम उबारू ।
विप्र राव सौ वचन सुनावै, गये लंघि नींद क्यूं आवै ॥२९॥
भयंकर अंधेरी रात और बहुत बडा जंगल प्रांत, उसमें वे दोनों हरि नाम का जोर से उच्चारण कर रहे थे । विप्र ने घबरा कर राव से ये वचन सुनाये कि उन दोनों संतों ने रक्षक चौकी पार कर ली है इसलिये मुझे किस प्रकार नींद आ सकती है । संतों के चौकी पार करने की बात सुन कर विप्र और राव की नींद उड़ गई ॥ २९॥
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तेज वचन कहि चमके राजा, एहा देव लखे नहीं आजा ।
कहै इही हि को गईया, पोथी सोधि भेद हम लहिया ॥३०॥
राजा ने चमक कर तेज वचनों से कहा कि इस तरह का देव पुरुष मैने आज तक नहीं देखा । विप्र ने कहा कि वे दोनों इसी मार्ग से गये हैं यह मैंने अपने ज्योतिष के ग्रन्थ देख कर सोध कर लिया है ॥३०॥
(क्रमशः)

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