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*फल पाका बेली तजी, छिटकाया मुख मांहि ।*
*सांई अपना कर लिया, सो फिर ऊगै नांहि ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)*
*साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ*
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सन्ध्या हुई, मन्दिरों में आरती हो रही है । श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में छोटे तख़्त पर बैठकर जगज्जननी का चिन्तन कर रहे हैं । राखाल, लाटू, रामलाल, किशोरी गुप्त आदि भक्तगण उपस्थित हैं । मास्टर आज रात को ठहरेंगे । कमरे के उत्तर की ओर एक छोटे बरामदे में श्रीरामकृष्ण एक भक्त के साथ एकान्त में बातें कर रहे हैं । कह रहे हैं, “भोर में तथा उत्तर-रात्रि में ध्यान करना अच्छा है और प्रतिदिन सन्ध्या के बाद ।” किस प्रकार ध्यान करना चाहिए, साकार ध्यान, अरूप ध्यान, यह सब बात बता रहे हैं ।
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थोड़ी देर बाद श्रीरामकृष्ण पश्चिम के गोल बरामदे में बैठ गए । रात के नौ बजे का समय होगा । मास्टर पास बैठे हैं, राखाल आदि बीच बीच में कमरे के भीतर आ-जा रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण(मास्टर के प्रति)- देखो, यहाँ पर जो लोग आएँगे, उन सभी का सन्देह मिट जाएगा; क्या कहते हो ?
मास्टर- जी हाँ ।
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उसी समय गंगा में काफी दूरी पर माँझी अपनी नाव खेता हुआ गाना गा रहा था । गीत की वह ध्वनि मधुर अनाहत ध्वनि की तरह आकाश के बीच में से होकर मानो गंगा के विशाल वक्ष को स्पर्श करती हुई श्रीरामकृष्ण के कानो में प्रविष्ट हुई । श्रीरामकृष्ण उसी समय भावाविष्ट हो गए । सारे शरीर के रोंगटे खड़े हो उठे । श्रीरामकृष्ण मास्टर का हाथ पकड़कर कह रहे हैं, “देखो, देखो, मुझे रोमांच हो रहा है । मेरे शरीर पर हाथ रखकर देखो ।”
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प्रेम से आविष्ट उनके उस रोमांचपूर्ण शरीर को छूकर वे विस्मित हो गये । ‘पुलकपूरित अंग !’ उपनिषद् में कहा गया है कि वे विश्व में आकाश में ‘ओतप्रोत’ होकर विद्यमान हैं । क्या वे ही शब्द के रूप में श्रीरामकृष्ण को स्पर्श कर रहे हैं ? क्या यही शब्दब्रह्म है?*
(*एतस्मिन् नु खलु अक्षरे गार्गि आकाश ओतश्च प्रोतश्च । -बृहदारण्यक उपनिषद्, ३-८-११; शब्दः खे पौरुषं नृषु । - गीता, ७/८)
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थोड़ी देर बाद श्रीरामकृष्ण फिर वार्तालाप कर रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण- जो लोग यहाँ पर आते हैं, उनके शुभ संस्कार हैं, क्या कहते हो ?
मास्टर- जी, हाँ ।
श्रीरामकृष्ण- अधर के वैसे संस्कार थे ।
मास्टर- इसमें क्या कहना है !
श्रीरामकृष्ण- सरल होने पर ईश्वर शीघ्र प्राप्त होते हैं । फिर दो पथ हैं, - सत् और असत्, सत् पथ से जाना चाहिए ।
मास्टर- जी हाँ, धागे में यदि रेशा निकला हो तो वह सुई के भीतर नहीं जा सकता ।
श्रीरामकृष्ण- कौर के साथ मुँह में केश चले जाने पर सब का सब थूककर फेंक देना पड़ता है ।
मास्टर- परन्तु जैसे आप कहते हैं, जिन्होंने ईश्वर का दर्शन किया है, असत्-संग उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता; प्रखर अग्नि में केले का पेड़ तक जल जाता है !
(क्रमशः)

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