शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

मध्य का अंग ३७/४२

 
🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ १६. मध्य का अंग)
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*घर वन मांही सुख नहीं, सुख है सांई पास ।*
*दादू तासौं मन मिल्या, इनतैं भया उदास ॥३७॥*
*बैरागी वन में बसै, घरबारी घर मांहि ।*
*राम निराला रह गया, दादू इनमें नांहि ॥३८॥*
अतः श्रुति युक्ति से आत्मा को सर्वव्यापक मानकर संसार में रहता हुआ शान्त दान्त हो कर भगवान् की प्राप्ति के लिये यत्न करना चाहिये । 
सुरेश्वराचार्य ने वार्तिकामृत में लिखा है- याज्ञवाल्क्य गृहस्थी होते हुए भी पूर्ण ज्ञानी थे और संन्यास धारण करके वैष्णव पद को प्राप्त कर लिया था ।
जितेन्द्रिय को वन में रहने की क्या आवश्यकता है और आश्रमों में भी रहने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जितेन्द्रिय पुरुष जहां भी रहेगा, वह ही स्थान उसके लिये वन और आश्रम हो जायेगा ।
जो सदाचारी तथा जितेन्द्रिय हैं और नम्र भाव से रहता है तो उसके लिये आश्रम की कोई आवश्यकता नहीं है । - पद्मपुराण में – स. ३२ अध्याय –
रागी पुरुष को वन में भी दोष सता सकते हैं और जिसने पाँचों इन्द्रियों को जीत लिया, उसके लिये घर भी तप का स्थान है । जो अच्छा कर्मों में लगा हुआ है तथा सबसे राग शून्य है, उसके लिये घर भी तपोवन के समान है ।
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*॥ सुमिरण नाम निरसंसे ॥*
*दीन दुनी सदिकै करूं, टुक देखण दे दीदार ।*
*तन मन भी छिन छिन करूं, भिश्त दोजग भी वार ॥४०॥*
*दादू जीवन मरण का, मुझ पछतावा नांहि ।*
*मुझ पछतावा पीव का, रह्या न नैनहुँ मांहि ॥४१॥*
*स्वर्ग नरक संशय नहीं, जीवन मरण भय नांहि ।*
*राम विमुख जे दिन गये, सो सालैं मन मांहि ॥४२॥*
मैं दीर्घायु होऊं या अल्पायु इस विषय में मुझे जरा भी विचार या पश्चात्ताप नहीं है, क्योंकि कितनी भी लम्बी आयु हो जाय, फिर भी वह स्वल्प ही मानी जाती है । 
कठोपनिषद् में कहा है कि- यह मनुष्य जीर्ण होने वाला मरणधर्मा है । इस तत्त्व को अच्छी प्रकार से जानने वाला इस मनुष्य लोक में कौन ऐसा मनुष्य है, जो बुढापे से रहित मरने वाला न हो । आप जैसे महात्माओं का संग प्राप्त करके भी स्त्री-सौन्दर्य-क्रीड़ा आमोद-प्रमोद का बार-बार चिन्तन करता हुआ बहुत काल तक जीने में कौन प्रेम करेगा । इसी प्रकार स्वर्ग नरक में जाने का भी कोई संशय नहीं है । आज ही मरण क्यों न हो जाय या दिनान्तर में । मेरे मन में तो यह ही बड़ा दुःख है कि जो दिन भगवान् की भक्ति के बिना चले गये, वे दिन कांटे की तरह चुभ रहे हैं, क्योंकि गये हुए दिन फिर जीवन में वापस नहीं आते हैं । अतः साधक को चाहिये कि दिन रात भगवान् का स्मरण ध्यान करता रहे । एक दिन भी व्यर्थ में नहीं खोए अन्यथा पश्चाताप करना पड़ेगा । 
(क्रमशः)

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