बुधवार, 19 अगस्त 2020

मध्य का अंग २५/३१

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ १६. मध्य का अंग)
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*चलु दादू तहँ जाइये, माया मोह तैं दूर ।*
*सुख दुख को व्यापै नहीं, अविनासी घर पूर ॥२५॥*
जो माया मोह से रहित सर्वव्यापक सुख दुःख से रहित ब्रह्मतत्त्व है, वे ही हमारा प्राप्य होने से घर की तरह अविनाशी घर है । हे साधक ! तुम भी वहां पर पहुँचो जिससे तुमको भी ब्रह्म की प्राप्ति हो जावे । 
वासिष्ठ में- अज्ञानरुपी रात्रि के नष्ट हो जाने पर चिद्रूप सूर्य के प्रकाश में परमानन्द को प्राप्त हुई, ज्ञानी की बुद्धि सुशोभित होती है । अज्ञान निद्रा के नष्ट होने पर ज्ञान रूपी सूर्य से जगा हुआ साधक उस ज्ञान को प्राप्त कर लेता है । जिससे वह संसार में फिर से मोहित नहीं होता ।
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*चलु दादू तहँ जाइये, जहँ जम जोरा को नांहि ।*
*काल मीच लागै नहीं, मिल रहिये ता मांहि ॥२६॥*
जहां पर यमराज के दण्ड का भी भय नहीं है न मृत्यु का भय है । और न आयु के क्षीण होने का भय है । हे साधक ! तुम भी वहां जाकर उस ब्रह्म में लीन होकर सुखी हो जाओ । 
कठोपनिषद् में- उसके भय से अग्नि तपता है, सूर्य प्रकाश दे रहा है, इन्द्र वर्षा बरसाता है और वायु दिनरात चलता रहता है । मृत्यु भी जिसके भय से प्राणियों का नाश कर रही है ।
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*एक देश हम देखिया, जहँ ऋतु नहीं पलटै कोइ ।*
*हम दादू उस देश के, जहँ सदा एक रस होइ ॥२७॥*
*एक देश हम देखिया, जहँ बस्ती ऊजड़ नांहि ।*
*हम दादू उस देश के, सहज रूप ता मांहि ॥२८॥*
*एक देश हम देखिया, नहिं नेड़े नहिं दूर ।*
*हम दादू उस देश के, रहे निरंतर पूर ॥२९॥*
*एक देश हम देखिया, जहँ निशदिन नांहीं घाम ।*
*हम दादू उस देश के, जहँ निकट निरंजन राम ॥३०॥*
*बारहमासी नीपजै, तहाँ किया परवेश ।*
*दादू सूखा ना पड़ै, हम आये उस देश ॥३१॥*
मैंने निर्विकल्प समाधि प्रदेश में उस ब्रह्म का अनुभव किया है । जहां पर किसी भी प्रकार की ऋतुओं का परिवर्तन नहीं होता अर्थात् जवानी बुढ़ापा आदि का परिवर्तन नहीं होता, क्योंकि वह नित्य है । उसमें कोई भी विकार नहीं हो सकता है । वहां समाधि में स्थित रहने वाला साधक भी एकरस रहता है । जहां पर मुक्ति के देने वाले दैवीगुण और आसुरी संपत्तियों के अवगुण भी नहीं रहते हैं, क्योंकि वह ब्रह्मगुणातीत है । वह देश न दूर है और न समीप ही है । वहां पर मन इन्द्रियों की कोई वृत्ति नहीं होती, क्योंकि वे सब ब्रह्म में लीन हो जाती हैं । अज्ञानरूप दुःख की तो वहां छाया भी नहीं रहती, क्योंकि अज्ञान का ही नाश हो जाता है । किन्तु साधक को वह ब्रह्म नजदीक ही प्रतीत होता है, क्योंकि वह अपना ही स्वरूप है और वहां पर अज्ञानजन्य दुःख की वृष्टि भी नहीं होती, किन्तु ब्रह्म के आनन्द स्वरूप होने के कारण सदा आनन्द ही आनन्द भासता रहता है । 
(क्रमशः)

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