🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*५. परचा कौ अंग ~ २९७/३००*
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जैसा रूप अकास का, (अैसा) धरती का जो होइ ।
कहि जगजीवन सुंनि मैं, आसन बांधै सोइ ॥२९७॥
संत जगजीवन जी कहते हैं जैसा स्वरुप आकाश का है अगर वैसा ही धरती का भी हो तो साधक शून्य की स्थिति में आसन लगा सकते हैं । आकाश बिल्कुल समदृश्य है जबकि पृथ्वी पर विभिन्नता है ।
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ते मुनि जन निहचल सदा, तेज पुंज की प्यास ।
रस मांहीं रस एक रस, सु कहि जगजीवनदास ॥२९८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि वे संत मुनि निश्चल हैं जिन्हें तेज पुंज की प्यास है वे सभी आनंद में एक आनंद प्रभुनाम को ही मानते हैं । संत कहते हैं वह ही श्रेष्ठ है ।
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सबद सरीखा होइ तन, तब जाइ मांहि समाइ ।
कहि जगजीवन देह मुइ२, अंग मंहि नेक३ न माइ ॥२९९॥
{२. मुइ-मृत के समान (=तुच्छ)} (३. नेक-कुछ)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जैसा प्रभु नाम है वैसी ही देह हो और वह शब्द में ही विलीन हो जाये । किंतु यह मरी देह तो ऐसी है कि जरा सी भी प्रभु नाम में नहीं रमती ।
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सूकि्षम कर सौ सब ग्रहै, सुर नर बंदै ताहि ।
कहि जगजीवन आदि हरि, चित मंहि याही चाहि ॥३००॥
संतजगजीवन जी कहते हैं की जो सू्क्ष्म है वह तो सभी के लिये ग्रहणीय होता है । उसकी कामना तो देव जन सब करते हैं । संत कहते हैं कि परमात्मा ही चित में रहे बस यही चाहते हैं ।
(क्रमशः)

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