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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग सूहा २२(गायन समय दिन ९ से १२)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**अथ काया बेली ग्रन्थ**
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३५६ - **पिंड ब्रह्माँड शोधन ।** पँजाबी त्रिताल
साचा सतगुरु राम मिलावै, सब कुछ काया माँहिँ दिखावै ॥टेक॥
काया मांहीं सिरजनहार, काया मांहीं है ओंकार ।
काया मांहीं है आकाश, काया मांहीं धरती पास ॥१॥
काया माँहीं पवन प्रकाश,काया मांहीं नीर निवास ।
काया मांहीं शशिहर सूर, काया मांहीं बाजैं तूर॥२॥
काया मांहीं तीनों देव, काया मांहीं अलख अभेव ।
काया मांहीं चारों वेद, काया मांहीं पाया भेद॥३॥
काया मांहीं चारों खाणी, काया मांहीँ चारों वाणी ।
काया मांहीं उपजै आइ, काया मांहीं मर मर जाइ॥४॥
काया मांहीँ जामैं मरै, काया मांहीं चौरासी फिरै ।
काया मांहीं ले अवतार, काया मांहीं बारम्बार ॥५॥
काया मांहीं रात दिन, उदय अस्त इकतार ।
दादू पाया परम गुरु, कीया एकंकार ॥६॥
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३५६ - ३६३ में जो ब्रह्माँड में है वही काया में भी है यह दिखाते हुये पिंड ब्रह्माँड की एकता बता रहे हैं –
**= साचा सतगुरु राम मिलावै, सब कुछ काया माँहिं दिखावै =**
गुरु के लक्षण जिनमें घटित हों, ऐसे सच्चे सद्गुरु शरीर के भीतर ही हृदय में निरंजन राम का दर्शन करा देते हैं और जो ब्रह्माँड में है, वह सब कुछ शरीर के भीतर ही दिखा देते हैं ।
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**= काया माँहीं सिरजनहार =**
सृष्टि कर्ता ईश्वर व्यापक होने से शरीर में विद्यमान है । काया माँहीं है ओंकार = हृदय स्थान के अनाहत पद्म में ओंकार स्थित है । वहां जो "हँस" ध्वनि होती है, वही ओंकार है । "हँस" से उलटकर "सोऽहँ" होता है और "सोऽहँ" से सकार हकार निकल कर "ओं" बनता है ।
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**= काया मांहीं है आकाश =**
वैसे तो अवकाश रूप आकाश शरीर में प्रसिद्ध ही है और योगियों के मतानुसार कंठ स्थित विशुद्ध चक्र में आकाश का विशेष निवास है । उसमें अनन्त श्लोकादि विद्या स्थित रहती है, लोक में भी प्रसिद्ध है, इसे बहुत पाठ कंठस्थ हैं ।
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**= काया मांहीं धरती पास =**
कार्य रूप से पृथ्वी स्थूल शरीर में प्रसिद्ध है, योगियों के मतानुसार पृथ्वी का विशेष निवास मेलाधार चक्र है तथा क्षमा रूप से मन के समीप रहती है ।
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**= काया मांहीं पवन प्रकाश =**
शरीर में प्राण रूप से वायु प्रसिद्ध है, योगीजन मत से वायु का विशेष निवास अनाहत चक्र में है । प्राणायाम से पापादि को नष्ट करके ज्ञान प्रकाश का परँपरा हेतु है ।
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**= काया मांहीं नीर निवास =**
शरीर में मूत्र, लारादि रूप से जल प्रसिद्ध है, योगियों के मतानुसार जल का विशेष स्थान स्वाधिष्ठान चक्र है । हृदय में प्रेम रूप से स्थित है ।
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**= काया मांहीं शशिहर सूर =**
शरीर में वाम - दक्षिण नेत्र रूप से चन्द्र - सूर्य स्थित हैं, योगियों के मतानुसार इड़ा नाड़ी चन्द्र और पिंगला सूर्य रूप है ।
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**= काया मांहीं बाजै तूर =**
शरीर में अनाहत ध्वनि रूप नगाड़ा और तुरही बाजे बजते हैं । जब मेलाधार चक्र में स्थित ब्रह्म - ग्रँथि का भली प्रकार भेदन होता है, तब धदयावस्था में अनाहत ध्वनि आरँभ होती है ।
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**= काया मांहीं तीनौं देव =**
नाभि स्थान पर ब्रह्मा, हृदय में विष्णु, मस्तक में सहस्रार चक्र में महादेव विराजते हैं ।
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**= काया माँहीं अलख अभेव =**
मनेन्द्रियों का अविषय अद्वैत ब्रह्म व्यापक होने से शरीर के प्रत्येक अणु में स्थित है ।
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**= काया मांहीं चारोँ वेद =**
योगियों के मतानुसार - नाभि स्थान में ऋग्, हृदय में यजु, कंठ में साम और मुख में अथर्वण कहा जाता है वो सँत जन नाम रटन को ऋग्, जरणा को यजु, सहन शक्ति को साम और अनुभव को अथर्वण कहते हैं, ये चारों शरीर में ही रहते हैं ।
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**= काया मांहीं पाया भेद =**
शरीर में ही भेद ज्ञान मिलता है, शरीर रहित चेतन में भेद कहां है ? वो साधन द्वारा शरीर में ही ब्रह्मात्म एकता का रहस्य मिलता है ।
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**= काया मांहीं चारों खाणी =**
चार प्रकार के जीवों की उत्पत्ति १ जरायुज(मनुष्य, चौपाये), २ अँडज(पक्षी, सर्पादि), ३ उद्भिज(वनस्पति) ४ स्वेदज(जेँ, लीख) रूप चार खानियां भी शरीर में हैँ । १ नाड़ी जरायुज, २ नेत्र अँडज ३ रोम उद्भिज ४ हड्डियां स्वेदज हैं, वो आत्मा, मन, प्रकृति, ज्ञान ये चार, आनँद, सँकल्प, प्रवृत्ति, प्रकाश पूर्ण होने से खानि रूप हैं ।
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**= काया मांहीं चारो वाणी =**
ब्रह्म वाणी - परा, देवताओं की पश्यन्ती, पशु - पक्षियों की मध्यमा, मनुष्यों के वैखरी । शरीर में इनके रूप स्थान, अवस्था और देवता इस प्रकार हैं –
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नाम==== रूप====स्थान=====अवस्था=देवता
परा==== बीज ====मूलाधार===तुरीया= सोऽहँ
पश्यन्ति =अंकुर====स्वाधिष्ठान =सुषुप्ति= ईश्वर
मध्यमा = पात===== हृदय ==== स्वप्न == विष्णु
वैखरी ==वृक्षविस्तार=मुख ===== जाग्रत =ब्रह्मा
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**= काया मांहीं उपजै आइ, काया मांहीं मर मर जाइ =**
श्रवण द्वारा सँस्कार हृदय में आकर भावनायें उत्पन्न होती हैं और विरोधी विचार धाराओं से वे बारँबार मिथ्या निश्चय रूप मरण को प्राप्त होकर हृदय से निकल जाती हैं ।
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**= काया मांहीं जामैं मरै =**
शरीर में मन के मनोरथ उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं ।
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**= काया मांहीं चौरासी फिरै =**
विविध भावनाओं में मन का गमनागमन ही चौरासी में फिरना है ।
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**= काया मांहीं ले अवतार, काया माँहीं बारँबार =**
जैसे धर्म स्थापना के लिए ब्रह्माँड में ईश्वर बारँबार नृसिंहादि अवतार लेते हैं, वैसे ही शरीर में मर्यादा स्थापन के लिए विवेकादि दिव्य गुण बारँबार प्रकट होते रहते हैं ।
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**= काया मांहीं रात दिन =**
शरीर में अज्ञान पूर्ण व्यवहार वो स्वप्न, रात्रि हैं और ज्ञान युक्त व्यवहार वो जाग्रत अवस्था रूप दिन होते ही रहते हैं ।
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**= उदय अस्त इकतार =**
व्यावहारिक ज्ञान के उत्पत्ति - नाश रूप उदय - अस्त लगातार होते ही रहते हैं ।
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**= दादू पाया परम गुरु, कीया एकंकार =**
जब हमने परम गुरु ब्रह्म को उसी की कृपा से प्राप्त किया, तब शरीर में ही अद्वैत निष्ठा द्वारा सँपूर्ण द्वैत का अद्वैत रूप में ही दर्शन किया ।
(क्रमशः)

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