बुधवार, 26 अगस्त 2020

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🌷 *#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु* 🌷
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*ज्यों घुण लागै काठ को, लोहा लागै काट ।*
*काम किया घट जाजरा, दादू बारह बाट ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ माया का अंग)*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु*, *विषयी*
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पुरुषोत्तमपुरी का भद्रतनु नामक ब्राह्मण पिता के मरने के बाद सुमध्यमा नाम वेश्या से लग गया था । पिता के श्राद्ध के दिन वेश्या से अलग रहना पड़ा । वह पिता का श्राद्ध करा रहा था तब उसका स्थूर शरीर तो श्राद्ध के कार्य में स्थित था किन्तु मन तो वेश्या के स्वरूप में ही फँसा था ।
विषयी मन शुभ कर्म में, लगता नहिं है लेश ।
भद्रतनु तन श्राद्ध में, मन वेश्या के भेश ॥१४७॥

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