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*सकल भुवन भानै घड़ै, चतुर चलावनहार ।*
*दादू सो सूझै नहीं, जिसका वार न पार ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*वक्त ब्यौरा का अंग १२२*
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अठार भार अरु अष्ट कुल, उडग१ सु एक न होय ।
रज्जब लघु दीरध रचे, आदम२ अंगुरी जोय३ ॥३३॥
अठारह भार वनस्पति, अष्ट कुल पर्वत और तारे१ एक से नहीं है, इन सबको ईश्वर ने छोटे बड़े ही बनाये हैं, देखो३, मनुष्य२ की अगुलियां भी छोटी-बड़ी ही हैं ।
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प्रभु पारस महँगा किया, सौंधे अश्म सु आन ।
रज्जब लघु दीरघ हु कम, समझो संत सुजान ॥३४॥
प्रभु ने पारस पत्थर को बहुमुल्य बनाया है और पत्थर कम मुल्य के बनाये हैं, इसी प्रकार हे सुजान संतों ! लघु-दीर्ध, अधिक-कम का विचार भी समझो ।
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रज्जब राजा किन१ किये, कोने२ किये सु रंक ।
ये अक्षर अविगत३ लिखे, निरखि ललाट हु अंक ॥३५॥
राजा किसने१ रचे हैं और रंक किसने२ बनाये हैं ? ये प्रारब्ध रूप अक्षर ईश्वर३ ने ही लिखे हैं, ललाट के अंक देख, उनसे ही विभिन्नता है ।
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बड़ पीपल अरु लांप तिण, उदाय अंकुर स्वभाय१ ।
लघु दीरध सु दयाल दत्त२, दोष न दीया जाय ॥३६ ॥
बड़ पीपल और लांप नामक तृण, इनके अंकुर स्वभाव१ से ही निकलते हैं, लांप घास छोटा और बड़-पीपल बड़े होने से तो दयालु प्रभु का ही दिया हुआ दान२ है, छोटे-बड़े होने का दोष लांप आदि को नहीं दिया जाता ।
(क्रमशः)

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