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*पीव सौं खेलूँ प्रेम रस, तो जियरे जक होइ ।*
*दादू पावै सेज सुख, पड़दा नाहीं कोइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*भक्ति-पंच-रस वर्णन*
*पांच भगत्ति१ कहें रस संतन,*
*सो विसतार भली विधि गाये ।*
*१बाछलि २दास्य ३सखापन ४शांत सु,*
*और ५सिंगार स्वरूप दिखाये ॥*
*टिप्पण२ को उर स्वाद लहो जव,*
*बैठ विचार करो मन भाये ॥*
*रोम उठे न बहै दृग तैं जल,*
*ऐस३ न प्रेम समुद्र बुडायें ॥४॥*
संतों ने भक्ति१ के पांच रस कथन करे हैं, सो मैंने अपनी इन्दवछंद रूप टीका में भली प्रकार विस्तार से गायन किये हैं । वे पांच रस ये हैं- १.वात्सल्य, २.दास्य, ३.सखापन, ४.शान्त और ५.श्रृंगार, इन पांचों के ही स्वरूप टीका में यथा स्थान दिखाये हैं । जब एकान्त में बैठकर इन मन भावन पांचों रसों का विचार करोगे तब टीका२ के द्वारा इनका आनन्द रूप स्वाद हृदय में अनायास ही प्राप्त करोगे । टीका द्वारा इन रसों का विचार करते समय जिनके न तो रोम ही खड़े होते और न नेत्रों से अश्रुरूप जल ही गिरता ऐसे३ प्राणी तो प्रभु-प्रेम रूप समुद्र में डूब नहीं सकते और प्रभु-प्रेम बिना आत्म ज्ञान नहीं होता, आत्मज्ञान बिना मुक्ति नहीं हो सकती यह श्रुति सिद्ध सिद्धांत अति प्रकट है ।
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पंच रसों का विशेष परिचय-
*१. वात्सल्य*- माता पिता का अपनी सन्तान पर जैसा प्रेम होता है वैसा ही वात्सल्य भगवान् में होना भक्ति का वात्सल्य रस है । इस रस के रसिक-दशरथ, कौशल्या, नन्द, यशोदा आदि हुए हैं ।
*२. दास्य*- अपने को भगवान् का सेवक मानकर दास के समान सेवा करते हुये भक्ति करना, भक्ति का दास्य रस है । इस रस के रसिक-हनुमान्, गरुड़, प्रहलाद, विभीषण आदि हुये हैं ।
*३. सखापन्*- अपने को भगवान् का मित्र मान कर सखा के समान व्यवहार करते हुये भगवान् की भक्ति करना भक्ति का सख्यत्व रस है । इस रस के रसिक सुग्रीव, निषादराज, अर्जुन, गोविन्द स्वामी आदि हुए हैं ।
*४. शांत*- जिसका स्थायी भाव निर्वेद, संसार की असारता और दुःखपूर्णता है तथा ब्रह्म स्वरूप आलंबन विभाव है वह शांत रस है । इस रस के रसिक ज्ञानी भक्ति शिव, सनकादिक, नारद, शुकदेव, कपिलदेवादि हैं । यह रस भक्ति की दृढ़ता का कारण है ।
*५. श्रृंगार*- भगवान् को पति और अपने को पत्नी मानकर की गई माधुर्य भाव की भक्ति ही, भक्ति का श्रृंगार रस है । इस रस की प्रधानता व्रज गोपिका आदि में पायी जाती है । जिस रस की प्रधानता जिस भक्ति में होती है उस भक्त की कथा में उस रस का पूर्ण रूप से प्रतिपादन होता ही है । इसीलिये उक्त इन्दव में चतुरदास जी ने कहा है कि- टीका में इन रसों के स्वरूप दिखाये गये हैं ।
(क्रमशः)

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