सोमवार, 17 अगस्त 2020

= *वक्त ब्यौरा का अंग १२२(५/८)* =

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*आप तैं उपाइ बाजी, निरखि देखै सोइ ।*
*बाजीगर को यहु भेद आवै, सहज सौंज समोइ ॥*
*जे कुछ किया सु करै आपै, येह उपजै मोहि ।*
*दादू रे हरि नाम सेती, मैल कश्मल धोइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*वक्त ब्यौरा का अंग १२२*
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त्रिविधि भांती त्रिगुणी१ करी, सो समसरि२ क्यों होय ।
आव३ अलूपै४ अकलि५ में, मन वच कर्म करि जोय६ ॥५॥
माया१, सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण रूप से तीन प्रकार की ही रची हुई है, ये समान२ कैसे होगी ? मन, वचन कर्म से विचार करके देखो६ तो बुद्धि५ में माया की आयु३ अलुप्त४ ही ज्ञात होगी अर्थात माया अपार ही ज्ञात होगी अथवा त्रिगुण रूपा माया ने प्राणियों की आयु३ उत्तम, मध्य, कनिष्ट तीन प्रकार रची है ये बराबर२ कैसे हो सकती है ? मन, वचन, कर्म से देखो६ तो बुद्धि५ में यह माया की रचना रूप आयु की व्यवस्था अलुप्त४ ही ज्ञात होगी अतः समयानुसार आयु३ की समाप्ति पर ही शरीर का नाश होता है, उसके शोक से रहित ही रहना चाहिये ।
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सिरज्या सिरजन हार का, मेट न सकई कोय ।
रज्जब दुरमति दोष धरि, बादि१ बकैं क्या होय ॥६॥
सृष्टिकर्त्ता प्रभु ने जिसके लिये जो धनादि रच दिये हैं, उनको कोई भी नष्ट नहीं कर सकता, दुर्बुद्धि वाले लोग उनमें दोषारोपण करके बकते हैं सो व्यर्थ है, उनके बकने से क्या होगा ?
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रज्जब रिधि सिधि भाग्य की, पाई पूरब दत्ति१ ।
ताहि देखी तप२ तपि उठै, अइया३ मूरख मत्ति४ ॥७॥
पहले दिये हुवे दान१ से भाग्यवश ही ऋद्धि सिद्धि प्राप्त होती है, उसे देखकर दु:ख२ से तप उठते हैं, यह३ मूर्ख बुद्धि४ का परिचय है ।
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दुख सुख साँई का दिया, जीवों पाया सोय ।
तो देखि दरिद्री ईश्वर हिं, क्यों सरतंखा१ होय ॥८॥
ईश्वर का दिया हुआ सुख-दुख जीवों को मिलता है, तब हे दरिद्री ! उपासना द्वारा ईश्वर को ही देख, क्यों दुखी१ हो रहा है । ईश्वर दर्शन से तेरा अच्छा समय आयेगा तब तुझे भी सभी सुख प्राप्त होंगे ।
(क्रमशः)

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