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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*५. परचा कौ अंग ~ २९३/२९६*
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झिलमिल मांहीं मन रहै, धरनि नहीं तहां आंन ।
कहि जगजीवन क्रिपा हरि, दास लहै तहां लांन ॥२९३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जहां प्रभु प्रभा में मन स्थिर हो, वैसा धरा पर अन्य स्थान नहीं है । जहाँ सेवक पर प्रभु कृपा करते हैं वहां ही सेवक लीन रहते हैं । वे अन्यत्र भटकते नहीं हैं ।
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तेज पुंज के वारणैं८, तन मन सकल सरीर ।
कहि जगजीवन हरि भगति, तहां रहै करि सीर ॥२९४॥
(८. वारणैं - द्वार पर)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि उस तेज पुंज के बलिहारी देह मन व सारा शरीर है । संत कहते हैं वहां ही हरि भक्ति में वहां ही रहना चाहिए, जहां भक्ति के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव हो ।
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मांही९ सुमिरण रांमजी, बाहरि नूर निवास ।
सोई देह विदेह है, सु कहि जगजीवनदास ॥२९५॥
{९. तुलनीय श्रीदादूवाणी-(१८ । २७)
देह रहै संसार मैं, जीव रांम कै पास ।
‘दादू’ कुछ व्यापै नहीं, काल झाल दुख त्रास ॥}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि अंतर में तो स्मरण हो व बाहर प्रभु का तेज हो वह ही जीव देह धारण कर कर भी प्रभु में समर्पित विदेह होता है ।
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केसर चंदन वासना१, अंग मंहि आवै रांम ।
कहि जगजीवन स्त्रब सुख, नूर निरंजन रांम ॥२९६॥
१. वासना - वासना(=गन्ध)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जैसे केसर चदंन की सुगन्ध उनके बिना बोले ही प्रकट होती है ऐसे ही प्रभु स्मरण भी स्वयं ही प्रकट होता है । यह नाम प्रवाह व प्रभाव का आनंद है जो तेज रुप में प्रकट होता है ।
(क्रमशः)

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