सोमवार, 17 अगस्त 2020

= ३५० =

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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग विलावल २१(गायन समय प्रातः ६ से ९)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३५० - **परिचय** । एक ताल
ये मन मेरा पीव सौं, औरनि सौं नाँहीं ।
पीव बिन पलहि न जीव सौं, येह उपजै माँहीं ॥ टेक॥
देख देख सुख जीव सौं, तहं धूप न छाहीं ।
अजरावर मन बँधिया, तातैं अनत न जाहीं ॥१॥
तेज पुँज फल पाइया, तहां रस खाहीं ।
अमर बेलि अमृत झरै, पीव पीव अघाहीं ॥२॥
प्राणपती तहं पाइया, जहं उलट समाई ।
दादू पीव परचा भया, हियरे हित लाई ॥३॥
३५० - ३५१ में अपने साक्षात्कार की स्थिति बता रहे हैं - यह मेरा मन प्रियतम प्रभु के चिन्तन से ही प्रसन्न रहता है, अन्य किसी से भी प्रसन्न नहीं होता । मेरे हृदय में यही भावना उत्पन्न होती है - प्रियतम बिना एक क्षण भी जीवित न रह सकूंगा । 
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जहां इन्द्रिय ज्ञान रूप धूप और अज्ञान रूप छाया नहीं होती, उसी समाधि रूप स्थान में प्रभु को देख २ कर सुख से जीवित रहूंगा । मेरा मन देवताओं से भी अति श्रेष्ठ प्रभु स्वरूप में ही बंध रहा है, उसे छोड़कर अन्य स्थान को नहीं जाता । 
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उसने अपने साधन का फल प्रकाश - राशि प्रभु का दर्शन प्राप्त कर लिया है और सहजावस्था में आनन्द रस का उपभोग करता है । आत्मा रूप अमर बेलि के साक्षात्कार से आनन्दामृत सदा ही टपकता रहता है और हम वृत्ति द्वारा उसका बारम्बार पान करके तृप्त होते हैं । 
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वृत्ति विषयों से बदल के भीतर जाकर जहां लीन हो जाती है, वहां ही प्रभु प्राप्त होते हैं । हमें उस प्रभु का साक्षात्कार हो गया है और अब हम निरन्तर विशेषरूप से हृदय में स्थित उन प्रभु से ही स्नेह करते हैं ।
(क्रमशः)

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