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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“तृतीयोल्लास” ३४/३६)*
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*हिरनों को घेर लिया*
मार मार भई चहुं औरा, खंभा वंध कीनी अतिकोरा ।
राजा-जाके मांझिए नी कसी जाई, कोल्हू घाल गेरू पिलवाई ॥३४॥
चारों ओर से मारो मारो इस प्रकार हल्ला हो रहा था और राजा ने कहा हाथ से हाथ बांध कर सांकल बनालो जिससे ये हिरण निकलने न पावे । जिसके हाथों के बीच से हिरण निकल जायेगा, उसे कोल्हू तैल की घाणी में पिसवा दिया जायेगा ॥३४॥
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*हिरन राजा के पास से ही निकले*
पदम सिंघ धराजू राऊ इक इक दुहिवनि निकसी जाउ ।
दहुवानि अश्व दीन्ह ता लारू, पीछे मानुष बहुत पुकारू ॥३५॥
पदम सिंघ और धराजू राजा दोनों एक तरफ वन में निकल गये और दोनों ने उन हिरणों के पीछे अपने अपने घोड़े दौड़ाये तथा अन्य मनुष्य खूब जोर से हल्ला करने लगे ॥३५॥
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*मृग का शरीर बदल कर संत भये रुप*
आगे पीछै दौरा दौरा, ताला बेली लाई घोरा(हल्ला) ।
सहर बलेलि के पहुंचे पासू, पलटि सरीर भये निज दासू ॥३६॥
दोनों राजा और उसके नौकर सैनिक हिरणों के पीछे दौड़ लगा रहे थे, उनका पीछा कर रहे थे, और मनुष्य जोर जोर से हल्ला कर रहे थे, जब ये लोग शहर बलेलि के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा कि हिरण शरीर पलट कर दोनों भगवद् भक्त मानव रूप में आ गये ॥३६॥
(क्रमशः)

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