🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ १६. मध्य का अंग)
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*॥ निन्दा ॥*
*काला मुँह संसार का, नीले कीये पाँव ।*
*दादू तीन तलाक दे, भावै तीधर जाव ॥६५॥*
यह दोहा प्रासंगिक है – एक समय आंधी गांव में अनावृष्टि से जनता को दुःखी देखकर श्रीदादू दयालजी ने करुणापूर्ण हृदय से भगवान् से वर्षा के लिये प्रार्थना की(३/१५७) और उस प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान् ने वर्षा बरसाई । वहां के रहने वाले लोगों ने भगवान् को न पूजकर पीर की मजार पर जाकर पीर का पूजन करने लगे और उसकी प्रशंसा करते हुए कहा कि हे पीर बाबा, आपकी कृपा से ही वर्षा हुई है । जब दादूजी ने यह बात सुनी, तब उनका मन दुःखी सा हो गया और कहा कि ये लोग भगवान् की तो महिमा नहीं गाते और पीर को पूज रहे हैं । वर्षा तो भगवान् की कृपा से हुई है, अतः ये कृतघ्न हैं । हरि गुरु और सन्तों की शपथ खाकर कहता हूँ कि आज के पीछे इन कृतघ्न लोगों के लिये प्रभु से प्रार्थना कभी नहीं करूंगा ।
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*दादू भावहीन जे पृथ्वी, दया विहूणा देश ।*
*भक्ति नहीं भगवंत की, तहँ कैसा प्रवेश ॥६६॥*
जहां के रहने वाले पुरुष भगवान् की भावभक्तिरहित एवं निर्दयालु होते हैं, वहां पर सत्पुरुषों को नहीं जाना चाहिये, क्योंकि वे भक्तिमार्ग में बाधक बन जाते हैं ।
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*जे बोलैं तो चुप कहैं, चुप तो कहैं पुकार ।*
*दादू क्यों कर छूटिये, ऐसा है संसार ॥६७॥*
जब मैं उपदेश करता हूँ तो लोग कहते हैं कि मौन रहो, आपके उपदेश की आवश्यकता नहीं है । जब समाधिस्थ हो जाता हूँ तो कहते हैं कि – बोलते क्यों नहीं ? इस प्रकार दोनों तरह से असन्तुष्ट हो जाते हैं, उनसे निस्तार कैसे हो ? यह संसार ऐसा ही है कि किसी भी प्रकार से सन्तुष्ट नहीं होता । ऐसी स्थिति में साधक को निष्पक्ष ही रहना चाहिये ।
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*॥ मध्य ॥*
*न जाणूं, हाँजी, चुप गहि, मेट अग्नि की झाल ।*
*सदा सजीवन सुमिरिये, दादू बंचै काल ॥६८॥*
जहां लोग अपने-अपने पक्ष को लेकर वाद-विवाद करते हों, वहां यह कहकर कि मैं तो इस विषय में कुछ नहीं जानता, मौनधारण कर लेना चाहिये, अर्थात् वहां अज्ञानी बनकर अपने को वाद-विवाद से बचा लेना चाहिये । जहां पर उचित विवाद हो, वहां पर आपका कथन ठीक है ऐसा कहकर विवाद की अग्नि को शान्त कर देना चाहिये । इस प्रकार जो विवाद से दूर रह कर ईश्वर को भजते हैं, उनको काल का भय नहीं होता ।
(क्रमशः)

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