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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*५. परचा कौ अंग ~ ३२५/२८*
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मन मांही मन नांम ले, मन मांही मन जागि ।
मन मांही मन मिलि रहै, जगजीवन तहँ लागि ॥३२९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मन में ही मन नाम लेता है, मन से ही मन जागरण होता है, मन से ही मन किसी से मिलता है, जहां उसका रुझान हो ।
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अंग की सेवा अंग की पूजा, अंग मंहि अंग समान ।
कहि जगजीवन आदि अंग, अलख लखै सो जांन ॥३३०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु का अंग ही प्रभु का स्वरूप है । और उसी की पूजा होती है । और वह ही सब में निहित है । जो आरम्भ से ही उन प्रभु के स्वरुप को जानते हैं वे ही परमात्मा को जानते हैं ।
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सारी अनभै सुन्नि रस, आंपण बोलै रांम ।
कहि जगजीवन साध सुण, प्रेम पीव भरि धांम ॥३३१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि अनुभव कहता है कि शून्य जो गुण रहित है वहां स्थित हो राम नाम बोलें । संत कहते हैं कि साधु जन उस भगवन्नाम रस का ही प्रेम से अपने धाम में पान करते हैं ।
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सारी३ अनभै सुन्नि रस, सहज सबद सब ठांम ।
कहि जगजीवन स्वयं सिध, गुणवंत गावै नांम ॥३३२॥
{३. सारी-सम्पूर्ण(समस्त)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सब अनुभव सार शून्य में ही बताते हैं । जो सहज रुप से सब स्थान पर सुना जा सकता है । इसे किसी मंत्र या विधा से सिद्ध नहीं करना पढता है यह स्वयं सिद्ध है जिसका सभी गुणगान करते हैं ।
(क्रमशः)

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