रविवार, 30 अगस्त 2020

*५. परचा कौ अंग ~ ३४१/४४*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*५. परचा कौ अंग ~ ३४१/४४*
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भूख त्रिखा मोहि नांम की, प्रेम भगति की प्यास । 
नूर हि खाणां पीवणां३, सु कहि जगजीवनदास ॥३४१॥
(३. खाणां पीवणां-भोजन करना, जल पीना)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि भगवत्प्रेम में भूख प्यास का क्या महत्व ? प्रेम भक्ति की तृषा ही महत्व पूर्ण है परमात्मा के तेज के दर्शन ही भोजन व प्यास है । ऐसा संत कहते हैं ।
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नौ खंड प्रिथवी नांम रत, भगति करै ल्यौ लाइ ।
कहि जगजीवन रांमजी, सो मति४ दीजै आइ ॥३४२॥
{४. मति - बुद्धि(ज्ञान)}
संतजगजीवन जी कहते हैं नौ लोक व पृथ्वी जिस के नाम में रत है लगे हैं और भक्ति कर रहे हैं संत कहते हैं कि हे प्रभु हमें भी ऐसी बुद्धि प्रदान करें ।
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जगजीवन साहिब रमैं, जे मन समझै घाट५ ।
गंग जमुन के मधि हरि, प्रेम पिवण की बाट६ ॥३४३॥
(५. घाट - ज्ञान का मार्ग) (६. बाट - प्रतीक्षा)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु वहां ही रहते हैं जिस मन को वे अपना विश्राम मानते हैं । हमारी इड़ा पिंगला नाड़ियां जो गंगा यमुना सदृश हैं, प्रभु जी तो उनके मध्य स्थित होकर हमें ज्ञानामृत के साथ प्रेम भी पान करवाते हैं ।
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रांम नांम सब अंग मंहि, बाहर भीतर तेज ।
कहि जगजीवन सुंदरी, शोभित पिव की सेज ॥३४४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि भीतर बाहर सभी अंगो में परमात्मा का तेज बना है, उस तेज से शोभित आत्मा सुन्दरी प्रभु सानिध्य में शोभित है ।
(क्रमशः)

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