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*परमेश्वर अरु परम गुरु, दोउ एक सामान ।*
*'सुंदर' कहत विशेष यह, गुरु ते पावें ज्ञान ॥*
*(संतकवि सुन्दरदास जी महाराज)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*गुरु दादू गुरु परमगुरु, शिष पोता पर्यन्त ।*
*आगे पीछे वर्ण तैं, मत कोई दूखो संत ॥१६॥*
संप्रदाय के आद्याचार्य श्री दादूजी महाराज के गुरु वृद्ध भगवान् उनके शिष्य दादूजी, और दादूजी के शिष्य तथा पोता शिष्य परमगुरु प्रह्लादास जी आदि तक की कथायें मैं वर्णन करूंगा किन्तु अनुक्रम नहीं रह सकेगा काल-ज्ञान के अभाव से आगे पीछे भी वर्णन हो सकता है । इस दोष से कोई भी संत दुःख नहीं माने । कारण-इस दोष का हटना मेरे द्वारा असंभव ही ज्ञात होता है ।
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*हूं१ कुछ समझूं हूं नहीं, महल२ मिसल३ की बात ।*
*जगत पिता सम जपत हूं, हरि हरिजन४ गुरु तात५ ॥१७॥*
मैं१ अवसर२ के समान३ की बात कहना रूप चातुर्य्य कुछ भी नहीं जानता हूँ किन्तु हरि, भक्तजन४ गुरु और शिष्यों५ को जगत पिता परमात्मा के समान ही जान कर परमात्मा के नाम का जप करता रहता हूं अर्थात् इनमें भेद नहीं समझता ।
(क्रमशः)

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