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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“तृतीयोल्लास” ४३/४५)*
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*राजा ब्राह्मण त्राहि त्राहि पुकारे*
ब्राह्मण, राव सोवत से जागा, उठि दोऊ तब चरननि लागा ।
ऊंचे सुर टेरै दोऊ भारी, ‘कीजे रछया देव हमारी ॥४३॥
ब्राह्मण ओर राजा को ऐसा प्रतीत हुआ मानो सोते से जागे हो और दोनों उठकर संतों के चरणों मे गिर गये एवं ऊंचे स्वर जोर से टेर कर कहा हे देव अब आप हमारी रक्षा करें ॥४३॥
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विप्र कहै ‘‘मैं शरने आया, इहै बचन बोले है राजा’’ ।
राव विप्र दोऊ बूझे भेदू, बोलो देव और करो निषेदू ॥४४॥
विप्र ने कहा मैं आपकी शरण में आ गया हूं यही वचन राजा ने भी कहे, राजा और विप्र ने इस घटना का रहस्य जानना चाहा ओर कहा हे देव इसका तात्पर्य बोलकर बतावें और क्या नहीं करे यह भी बताओ ॥४४॥
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*जिज्ञासुता*
इष्ट उपासन कौन तुम्हारौ, विद्या कौंन सु मंत्र उचारौ ।
कौन नेम कौन है वरतू, कोन भेद सो तुम्हे न मरतू ॥४५॥
हे संतों आपका उपास्य देव कौन है, और तुम्हारी विद्या कौनसी है एवं कौन से मंत्र का उच्चारण करते हो । आपका नियम और व्रत क्या है यह कौनसा रहस्य है कि तुम्हारे पास मृत्यु नहीं आती ॥४५॥
(क्रमशः)

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