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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग सूहा २२(गायन समय दिन ९ से १२)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**काया बेली ग्रन्थ**
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३५७ - त्रिताल
काया मांहीं खेल पसारा, काया मांहीं प्राण अधारा ।
काया मांहीं अठारह भारा, काया मांहीं उपावनहारा ॥१॥
काया मांहीं सब बन राइ, काया मांहीं रहे घर छाइ ।
काया मांहीं कंदलि१ वास, काया मांहीं है कैलाश ॥२॥
काया मांहीं तरुवर छाया, काया मांहीं पँखी माया ।
काया मांहीं आदि अनँत, काया मांहीं है भगवन्त ॥३॥
काया मांहीं त्रिभुवन राइ, काया मांहीं रहे समाइ ।
काया मांहीं चौदह भवन, काया मांहीं आवागवन ॥४॥
काया मांहीं सब ब्रह्मँड, काया मांही हैं नव खँड ।
काया मांहीं स्वर्ग पयाल३, काया मांहीं आप दयाल ॥५॥
काया मांहीँ लोक सब, दादू दिये दिखाइ ।
मनसा वाचा कर्मना, गुरु बिन लख्या न जाइ ॥६॥
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**= काया माँहीं खेल पसारा =**
जैसे ब्रह्माँड में विविध लीलाओं के फैलाव हैं, वैसे ही काया में भी मन, बुद्धि,चित्त, अहँकार, इन्द्रियादि के विविध व्यवहार ही विविध लीलाओं के फैलाव हैं - नि:शँक निर्भय मनोवृत्ति ही राजा है, अन्य वृत्तियां प्रजा है, सँतोष धन, आशा दरिद्रता है, दैवी गुण उत्तम जन हैं, आसुर गुण अधम जन हैं इत्यादि सभी विस्तार शरीर में हैं ।
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**= काया माँहीं प्राण अधारा =**
जैसे ब्रह्माँड का आधार ईश्वर चेतन है वैसे ही काया में प्राणों का आधार जीव चेतन है ।
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**= काया माँहीं अठारह भारा =**
जैसे ब्रह्माँड में अठारह भार वनस्पति हैं, वैसे ही शरीर में रोमावली ही अठारह भार वनस्पति हैं । बीस पँसेरी का माप एक भार कहलाता है । प्रत्येक वनस्पति का एक - एक पत्ता लेकर तो ने से अठारह भार(४५ मण) बोझ होता है, इसीलिए वनस्पतियों को अठारह भार कहते हैं ।
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**= काया माँहीं उपावनहारा =**
जैसे ब्रह्माँड का उत्पन्न करने वाला ईश्वर ब्रह्माँड में है, वैसे ही स्वप्नादि रूप जीव सृष्टि का उत्पन्न करने वाला जीव चेतन शरीर में स्थित है ।
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**= काया माँहीं सब वनराइ =**
जैसे ब्रह्माँड में नाना वन हैं, वैसे ही शरीर में शिर - केश, चिबुक - केश, बगलकेशादि सब वन पँक्ति हैं ।
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**= काया माँहीं रहे घर छाइ =**
जैसे ब्रह्माँड के प्रदेश में घर बना कर रहते हैं वैसे ही काया के हृदय देश में निज निश्चय रूप घर बना कर, उसमें जीवात्मा स्थिर रहता है ।
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**= काया माँहीं कंदलि१ वास =**
जैसे ब्रह्माँड की गुफा में साधक निवास करते हैं, वैसे ही काया की भ्रमर कंदरा१ में साधक का चित्त निवास करता है ।
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**= काया माँहीँ है कैलाश =**
शरीर में शून्य चक्र ही कैलाश है ।
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**= काया मांहीं तरुवर छाया =**
शरीर में ब्रह्म – वृक्ष है और सुख ही उसकी छाया है ।
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**= काया माँहीं पँखी माया =**
माया - मोहित जीव ही ब्रह्म - वृक्ष पर रहने वाला पक्षी है ।
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**= काया मांहीं आदि अनन्त =**
ब्रह्माँड में जैसे वृक्षादि का आदि बीज होता है फिर उसका विस्तार अनन्त हो जाता है, वैसे ही काया में किसी भी कार्य का प्रथम सँकल्प आदि है फिर उसका विस्तार अनन्त हो जाता है वो शब्द सृष्टि का आदि ओंकार हृदय में है और उसका कार्य रूप विस्तार भी अनन्त शब्द हृदय में है ।
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**= काया माँहीं है भगवँत =**
शरीर में आत्म रूप से भगवान् स्थित हैं ।
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**= काया माँही त्रिभुवन राइ =**
स्वर्ग, मृत्यु, पाताल, इन तीनों भुवनों के राजा प्रभु शरीर के अष्ट दल कमल पर विराजते हैं ।
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**= काया माँहीं रहे समाइ =**
शरीर में स्थित प्राणी अपनी भावनानुसार वृत्ति द्वारा माया वो ब्रह्म में समाये रहते हैं ।
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**= काया माँहीं चौदह भवन =**
जैसे ब्रह्माँड में १४ लोक२ हैं । वैसे ही शरीर में हैं - भक्ति पक्ष में दश इन्द्रियाँ, चतुष्टय अन्त:करण ही १४ भुवन हैं । ब्रह्माँड के १४ भुवन और योगानुसार शरीर के भुवनों के नाम निम्न प्रकार हैं -
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लोक ======== निवासी === काया स्थान
०१ भू: ====== मनुष्य, पशु ==== नाभि
०२ भुव: ===== भूत, पक्षी ====== उर
०३ स्व: ======= देवता ====== हृदय
०४ महर् ====== ऋषि ====== छाती
०५ जन ==== सकामी भक्त ==== कंठ
०६ तप == सूर, सती, सन्यासी == नासिका
०७ सत्य === ज्ञानी, सन्यासी == दशम द्वार
०८ अतल ==== महादेव === == उदर
०९ वितल ==== बाणासुर ===== कमर
१० सुतल ==== मयनामा० ==== जँघा
११ तलातल ==== बलि ====== घुटने
१२ महातल = वासुकि नाग ==== पिंडली
१३ रसातल === शेष ===== गिरियाँ(टखने)
१४ पाताल == कद्रू के पुत्र === पगतली
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**= काया मांहीं आवागमन =**
मन का एक स्थान से आना और दूसरे पर जाना ही शरीर में आवागमन है ।
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**= काया मांहीं सब ब्रह्मँड =**
शरीर में चौदह भुवन रूप सभी ब्रह्माँड हैं । चौदह भुवन निकट पूर्व में ही बता आये हैं और १४ में से भी एक - एक में बहुत लोक भेद हैं जैसे एक स्व: के ही २१ भेद हैं – १-आसुरी स्वर्ग, २-भूत, ३-यम, ४-किन्नर, ५-ब्रह्म राक्षस, ६-राक्षस, ७-काल, ८-चित्रगुप्त, ९-योगिनी, १०-गन्धर्व, ११-अर्यमा, १२-महा स्वर्ग, १३-तप, १४-जन, १५-सत्य, १६-दवि, १७-सुरलोक, १८-देव स्वर्ग, १९-पयाली, २०-विश्वकर्मा, २१-खँड स्वर्ग तथा ....
अग्निपुराण में नाम भेद से निम्न प्रकार बताये हैं ~ १-आनँद, २-प्रमोद, ३-सौक्षय, ४-निर्मल , ५-त्रिविष्टप, ६-नाकपृष्ठ, ७-निर्वृत्ति, ८-पौक, ९-सौभाग्य, १०-अप्सरस, ११-निरहँकार, १२-शान्तिक, १३-अमल, १४-पुण्याय, १५-मँगल, १६-श्वेत, १७-मन्मथ, १८-उपसोहन, १९-शाँति, २०-निर्वेद, २१-अभेद । शरीर में मेरु दँड की २१ गाँठे हैं वे ही २१ स्वर्ग हैं । इसी प्रकार सँपूर्ण ब्रह्माँड भेद काया में स्थित है ।
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**= काया मांहीं है नव खँड ==**
जैसे जम्बू द्वीप की पृथ्वी के (१-इलावृत, २-रम्यक, ३-हिरण्यमय, ४-कुरू, ५-हरिवर्ष, ६-किंपुरुष, ७-भारतवर्ष, ८-केतुमाल वर्ष, ९-भद्राश्व वर्ष) नवखँड हैं वैसे ही शरीर में नव द्वार रूप नवखँड और योगमतानुसार नव चक्र ही नवखँड हैं । वे इस प्रकार हैं -
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=चक्रनाम===पँखुड़ी==अक्षर==देवता===स्थान
१. आधार====४====४====गणेश====गुदा
२. स्वाधिष्ठान==८====८=====ब्रह्मा====लिंग
३. मणिपूर===१०====१०====वायु====नाभि
४. निरंजन===८=====८=====मन====उदर
५. उद्यद====१२====१२====सूर्य====हृदय
६. विशुद्ध===१६====१६===चन्द्रमा===कँठ
७. बत्तीसा===३२====३२===विष्णु===तालू
८. आज्ञा====२=====२===महादेव==मस्तक
९. ब्रह्मरँध्र==१०००==१०००=दशोंदिशा=दशमद्वार
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**= काया माँहीं स्वर्ग पयाल =**
**= काया माँहीं आप दयाल ॥ =**
काया मांही लोक सब, दादू दिये दिखाय ।
मनसा वाचा कर्मना, गुरु बिन लख्या न जाय ॥
काया में ही दशम द्वार स्वर्ग, उदर मर्त्य लोक, पदतल पाताल३ हैं । अन्य भी १४ भुवन २१ स्वर्गादि सभी ब्रह्माँड के स्थानादि काया में दिखा दिये गये हैं किन्तु हम मन-वचन-कर्म से कहते हैं - सद्गुरु कृपा बिना यह बाह्य ब्रह्माँड शरीर में नहीं देखा जा सकता ।
(क्रमशः)

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