गुरुवार, 27 अगस्त 2020

= *वक्त ब्यौरा का अंग १२२(३७/४०)* =

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*कहाँ तैं एक अनेक दिखावा,*
*कहाँ तैं सकल एक ह्वै आवा ॥*
*दादू कुदरत बहु हैरानां,*
*कहाँ तैं राख रहे रहमाना ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*वक्त ब्यौरा का अंग १२२*
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कीड़ी कुंजर किन किये, लघु दीरघ दी देह ।
रज्जब दोष न दीजिये, देखि तमाशा१ येह ॥३७॥
चींटी और हाथी किसने रचे हैं ? एक का शरीर लघु और एक का बड़ा बनाया है । ये सब ईश्वर के ही रचे हुये हैं, उसे दोष न दो । जीव की बुद्धि ईश्वर रचना की समालोचना करने योग्य नाहीं है । उसका रचित यह अनोखा दृष्य१ देखकर उसी का स्मरण करो ।
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सांई समसरि१ ना किये, पंच खानि के प्राण ।
लघु दीरघ घटि वधि पटा, रज्जब रचे दिवाण२ ॥३८॥
ईश्वर ने जरायुज, अंडज, स्वेदज, उदभिज, नादज इन पंच खानियों के प्राणियों को समान१ नहीं रचा है, किसी को छोटा किसी को बड़ा बनाया है तथा उस प्रधान२ प्रभु ने जीविका के लिये पेट भी अधिक-कम दिये हैं सम नाहीं दिये यह प्रकट है ।
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रज्जब दुबिधा१ दूरि लग, स्वर्ग नरक व्है वास ।
एकों को देवल फिरै, इक जीव जाहि निराश ॥३९॥
यह भिन्नता१ दूर तक है, एक को स्वर्ग मिलता है, एक को नरक वास होता है एक(नामदेव वा भीखजन) के मंदिर फिरता है और एक जीव अपूर्ण आशा ही जाता है ।
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किन फराश निष्फल किये, किन किये अंब सफल्ल१ ।
एक हि करता उभय का, कौन करे हलचल्ल२ ॥४०॥
फराश वृक्ष को फल रहित और आम का फल-सहित१ किसने बनाया है ? दोनों को रचने वाला एक ही ईश्वर है, उसके रचना कार्य में उपद्रव२ कौन कर सकता है ?
(क्रमशः)

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