मंगलवार, 18 अगस्त 2020

मध्य का अंग २२/२४

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ १६. मध्य का अंग)
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*॥ माया ॥*
*दुहुँ बिच राम अकेला आपै, आवण जाण न देहि ।*
*जहँ के तहँ सब राखै दादू, पार पहुँचे तेहि ॥२२॥*
भक्त तथा मायिक पदार्थों के बीच में निराकार रूप से ब्रह्म विराजता है । इससे भक्तों का मन मायिक पदार्थों की इच्छा नहीं करता । मायिक पदार्थ भी उनके पास जाकर उनके मन को क्षुब्ध नहीं कर सकते क्योंकि बीच में बैठा हुआ भगवान् भक्तों के मन की रक्षा करता है । अतः भक्त भगवान् की कृपा से भक्ति करके परमानन्द स्वरूप हो जाते हैं । अन्यथा तो जीव ईश्वर का भेद करने वाली माया को पार करना बड़ा ही कठिन है । 
गीता में- यह मेरी माया त्रिगुणात्मिका है, इसको पार करना दुस्तर हैं । जो मेरी शरण में आ जाते हैं, वे भक्त ही मेरी माया को पार कर परमानन्दस्वरूप हो जाते हैं ।
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*॥ मध्य निर्पक्ष ॥*
*चलु दादू तहँ जाइये, जहँ मरै न जीवै कोइ ।*
*आवागमन भय को नहीं, सदा एक रस होइ ॥२३॥*
हे साधक ! निर्विकल्प समाधि भूमि में ब्रह्म रूपी कोई एक देश विशेष है । वहां के रहने वाले न जन्म लेते और न कभी मरते हैं वहां पर आने जाने का भी भय नहीं है । अतः तुम भी वहीं चलो । योगवासिष्ठ में कहा गया है कि- चित्तरूपी वेताल के शान्त हो जाने से और पवित्र स्थान को प्राप्त करने पर अब उत्तम भाग्य से शरीर रूपी नगरी में केवल मैं सुखपूर्वक स्थित हूँ । विवेकविचाररूपी मन्त्र से मनकी चिन्ता और अहंकाररूपी राक्षस का विनाश हो गया । अतः समस्त विषमताओं से रहित केवल अपने स्वरूप में स्थित हूँ ।
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*चलु दादू तहँ जाइये, जहँ चंद सूर नहिं जाइ ।*
*रात दिवस की गम नहीं, सहजैं रह्या समाइ ॥२४॥*
हे साधक ! निर्विकल्प समाधि भूमि में जहां पर चन्द्र सूर्य की भी गति नहीं है, वहां पर योगी सबको प्रकाशित करने वाले ज्योतिस्वरूप आत्मा को प्राप्त करके ब्रह्म रूप हो जाता है । कठोपनिषद में लिखा है कि- वहां न तो सूर्य प्रकाशित होता न चन्द्रमा और तारों का समुदाय ही प्रकाशित होता और न वहां पर ये बिजलियां ही प्रकाशित होती । फिर यह लौकिक अग्नि कैसे प्रकाशित हो सकता है । क्योंकि उससे प्रकाशित होने पर भी उसी के प्रकाश से सब प्रकाशित होते हैं । उसी के प्रकाश से सारा जगत् प्रकाशित हो रहा है । वहां पर ज्ञान अज्ञान की वृत्तियां नहीं होती किन्तु साधक उन्मनी अवस्था में जाकर स्व स्वरूप में स्थित हो जाता है । 
हठयोगप्रदीपिका में कहा है कि- जिसके आधे नेत्र खुले हों निश्चल मन हो, नासिका के अग्रभाग में दृष्टि लगावें जहां पर चन्द्र सूर्य भी लीन हो जाते हैं जहां पर मन भी निष्पन्द भाव को प्राप्त हो जाता है । ज्योति के समान सब का प्रकाशक और सब का कारण देह है, इन्द्रिय और मन, इनका साक्षी रूप परम तत्त्व स्वरूप जो आत्मस्वरूप पद है, जिनको यह नहीं कह सकते “वह यह है” । वहां पर योगी उन्मनी अवस्था में स्थित होता है । इससे अधिक क्या कहने के योग्य है ।
(क्रमशः)

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