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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“तृतीयोल्लास” ७/९)*
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*धराजू जैमल की कहानी*
इहै कथा अब इहां रहांनी, राव धिराजू कहूं बखानी ।
पंडित एक राव हजूरा, लच्छी दास और हरि सूं दूरा ॥७॥
यह संतों की, गोरखनाथ और माणक व ज्ञान दास की कथा यहां ही पूर्ण होती है, और राजा धिराजू जैमल कहानी आगे वर्णन की जाती है । राजा की सदा हाजरी में रहने वाला लच्छी जो कि लक्ष्मी का दास था ओर भगवान् से सदा दूर रहता था अर्थात् हरि द्रोही था ॥७ ।
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*६ महिने पहले पण्डित पुजारी*
षष्ठ मास सौं आगम पायो, सबै राव सो भेद जनायो ।
अचरज बात कहौं इक सोई, करो विचार राइ जो कोई ॥८॥
पुजारी लक्ष्मीदास विप्र ने छ: महिने पहले राजा से कहा(राज्य का भेद बताया सितिति) कि हे राजाजी मैं आपको एक आश्चर्य की बात बताता हूं । आप उस बात पर गहरा विचार करो ॥८॥
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कुलछनी मनिष प्रगटे आई, हम तुम सुधि रहे नहीं काई ।
ऐसी विद्या उनपे सोई, कबैजु उनको दर्सन होइ ॥९॥
हे महाराज अपने राज्य में कुछ ऐसे कुलक्षण वाले मनुष्य प्रगट होंगे जिनके बारे में आप को हमको किसी प्रकार की भी सूचना प्राप्त नहीं है, उनके पास इस प्रकार की विद्या है कि उनके कभी कभी दर्शन होते हैं ॥९॥
(क्रमशः)

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