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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“तृतीयोल्लास” २२/२४)*
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इतनी सुनी है संतों बातू, नख सिष चेटक लागी गातू ।
चलो बेग वार नहीं लाई, इहै अटपटी हमें न भाई ॥२२॥
गैवी संत हरिदास जी की यह बात सुनकर उन दोनों के संपूर्ण शरीर मन में बैचेनी उत्पन्न हो गई और कहा कि चलो देर मत करो इस प्रकार की संतों को सताने वाली बात हमें अटपटी अस्वाभाविक विचित्र लगती हैं ॥२२॥
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हरि दासनि सों कीजे दोष, तिनको आगे गति न मोक्ष ।
उनि दासनि सौं लायौ वादू, उघरे पाप आगिले आदू ॥२३॥
उन दोनों संतों ने आपस में विचार किया कि जो हरि के दासों भक्तों से दोष करते हैं पीडा पहुंचाते हैं, उनको आगे समय या जन्म में मोक्ष प्राप्त नहीं होती और सद्गति नहीं होती । जो उनसे व्यर्थ के वाद झगड़े करता है उनके अगले जन्म में पाप उघड़ जाते हैं अर्थात् पापों का फल प्राप्त करते हैं ॥२३॥
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*संत बैर से काल की फांसी*
संत बैर कुछ नाहीं भलाई, संत वैर तै परलै जाई ।
संत बैर तैं परे चौरासी, संत वैर काल की पासी ॥२४॥
संतों से बैर करने से कुछ भी भलाई नहीं होती और संतों से बैर करने से व्यक्ति नष्ट हो जाता है, संतों से बैर करने से प्राणी चौरासी लाख योनियों में भटकता है, संतों से बैर करना काल की फांसी है ॥२४॥
(क्रमशः)

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