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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“तृतीयोल्लास” १९/२१)*
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गैबी संत कहै समझाई, आगे फिरि है सब दुहाई ।
षट् दरसन सौं कीनों दोसू, अतीत फकरी जाहि वे मोखू ॥१९॥
गैबी संत ने समझाकर कहां कि आगे रास्ते में राव की दुहाई फिरती है । जिसके अनुसार षट्दर्शन के संतों को दोषी मानकर आगे जाने की आज्ञा नहीं है, भ्रमणशील फकीर ही बे रोकटोक आगे जा सकते हैं ॥१९॥
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सिन्धु किनारै फिरै दुहाई, जतन करंते निस दिन जाई ।
देखि अतीत रू कीजै घाता, षट् दर्शन कोऊ नहीं जाता ॥२०॥
समुद्र के किनारे राजा की दुहाई फिरती है और वहां के रक्षक रात दिन प्रयत्न करते हैं कि अतीत फकरों को देखकर उसका घात करो अत: षड्दर्शन का कोई साधु वहां नहीं जाता ॥२०॥
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ताहि देस मै इह अपराधू उहि उहि देस जाहु जनि साधु ।
जो तुम्हे जाहु जतन कुछ कीजै, चौकी राव सूं नहीं पतीजै ॥२१॥
उस देश में साधु का जाना एक अपराध माना जाता है । इसलिये अगर आप उस देश में जाते हैं तो अपनी रक्षा का कुछ उपाय करिये और राव की रक्षा चौकी के पास के क्षैत्र में बिल्कुल मत जाना ॥२१॥
(क्रमशः)

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