शनिवार, 22 अगस्त 2020

*५. परचा कौ अंग ~ ३०९/३१२*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*५. परचा कौ अंग ~ ३०९/३१२*
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सुंदरि साजै आरती, सनमुख रांम निवास२ ।
दीपक कोटि असंखि तहँ, सु कहि जगजीवनदास ॥३०९॥ 
२. निवास-स्थिति ।
संतजगजीवन जी कहते है कि आत्मा सुंदरी आरती सजा कर प्रभु के सन्मुख होती है । वहां अनंत कोटि दीपकों का प्रकाश होता है ।
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उर मैं हरि हरि रांमजी, अलख निरंजन रांम ।
कहि जगजीवन प्रेम रस, नख सिख भरि ले धाम३ ॥३१०॥
(३. धाम-शरीर) 
संतजगजीवन जी कहते है की हृदय में हरि हरि का व राम स्मरण हो वहां दृश्य से परे प्रभु हो उसी स्थान पर जा कर, हे आत्मा नख से शिख तक देह में प्रेमरस से परि पूर्ण राम नाम रस भर ले ।
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हरि हरि वाणी निरंजन, सबद सुहावत४ एह ।
कहि जगजीवन भजन करि, पावन करिये देह ॥३११॥
(४. सुहावत - अच्छा लगे)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे जीव हरि स्मरण करो जो अच्छा लगता है । भजन करने से देह पवित्र होती है ।
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अनहद नांद निवास महि, बसत बिदेही५ दास ।
कहि जगजीवन देह की, तिस घर आंन न प्यास ॥३१२॥
{५. बिदेही-जीवन्मुक्त(=ज्ञानी)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि अनाहत नाद में जहाँ प्रभु स्थित हैं वहां जीव जीव मुक्त हो कर रहता है वहां काया से कोइ आशा नहीं रहती । वहां काया तृषित नहीं तुष्ट रहती है ।
(क्रमशः)

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