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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*५. परचा कौ अंग ~ ३४५/४८*
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तेज पुंज ससि सूर मधि, झिलमिल झिल मिल होइ ।
जगजीवन उस ज्योति सूँ, अनंत ज्योति सब जोइ ॥३४५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिस तेज पुंज से सूर्य व चन्द्र के मध्य भी झिलमिल होती है उस परम तेजोमय प्रकाश से अनंत ज्योतियां प्रज्वालित होती हैं ।
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तेज पुंज सन्मुख धणीं७, ते तन मांहै जोइ ।
कहि जगजीवन तहँ रहै, ता सम अउर८ न कोइ ॥३४६ ॥
(७. धणीं - पति, परमेश्वर) {८. अउर - और(अन्य)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि इस देह में तेजोमय प्रभु ही रहें । वे जहाँ रहते है वहाँ उनके समान और कोइ नहीं रहता है ।
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तेज पुंज तहँ आरती, भाव भगति सौं होइ ।
कहि जगजीवन भोग हरि, अबिगति९ भावै सोइ ॥३४७॥
(९. अबिगति - परमात्मा)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जहां प्रभु का तेजोमय स्वरूप है वहां ही उन की आरती वंदन भाव भक्ति से होता है । और उन अविगत परमात्मा को जो भोग भा जाता है वही उन का भोग होता है ।
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तेज पुंज झिलमिल करै, नख सिख भरै निवास ।
तहां मन खेलै आतमा, सु कहि जगजीवनदास ॥३४८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जहाँ तेज पुंज झिलमिल करता है जो परमात्मा का परिपूरण स्वरुप है वहां ही मन व आत्मा प्रसन्न क्रीड़ा करते हैं, अर्थात प्रभु लीला करते हैं ।
(क्रमशः)

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