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*सतगुरु दाता जीव का, श्रवण सीस कर नैन ।*
*तन मन सौंज संवारि सब, मुख रसना अरु बैन ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*छप्पय -*
*गुर उर मधि उपकार,*
*करत कुछ तथा न राषी ।*
*सब लक्षण सब कृपा,*
*सकल भिन भिन कर भाषी ॥*
*रती इक रजमी१ आपि२,*
*काच तैं कंचन कीन्हों ।*
*जत सत ज्ञान विवेक,*
*धर्म धीरज दत३ दीन्हों ॥*
*श्री गुरु धुर४ तारण-तिरण,*
*हरण विघ्न त्रय ताप सुव५ ।*
*राघव के रक्षपाल तुम,*
*विकट बेर६ मधि बाप जुव ॥१८॥*
गुरुदेव के हृदय में जैसा परोपकार करने का भाव रहता है और जैसा वे करते आये हैं वैसा ही मेरे पर किया है, उसमें कुछ भी कमी नहीं रक्खी है । सर्व शुभ-लक्षण प्रदान करके सब प्रकार से कृपा करते हुये भिन्न-भिन्न प्रकार से समझाकर सभी बातें मुझे कही हैं ।
मैं काच के समान था, गुरुदेव ने मुझे एक रती मात्र अपना कृपा रूप बल१ देकर२ स्वर्ण के समान बना दिया है । उन्होंने ब्रह्मचर्य पालन तथा सत्य बोलने की शिक्षा दी और सत्यासत्य का निर्णय रूप विवेक, धर्म की शिक्षा, धर्म तथा आत्म ज्ञान रूप दान३ दिया ।
श्री गुरु निश्चय४ ही तारण-तिरण हैं अर्थात् आप संसार-सागर से तिरे हुये हैं और शरणागतों को तारते हैं । वे भगवत प्राप्ति के मार्ग में आने वाले कामादि रूप सभी विघ्नों को नष्ट करके अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव इन तीनों तापों को नष्ट५ करने वाले हैं । हे गुरुदेव ! भयंकर समय६ में मेरे तो आप ही पिता के समान७ रक्षक होते हैं, ऐसा ही मेरा अनुभव है ।
(क्रमशः)

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