सोमवार, 31 अगस्त 2020

*(“तृतीयोल्लास” ४६/४८)*

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
*(“तृतीयोल्लास” ४६/४८)* 
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माता पिता कौन सो कहिये, कहो देव भेद पुनि लहियें । 
तीनि लोक जाको विस्तारा, सुनौ विप्र सो इष्ट हमारा ॥४६॥ 
राजा ने कहा आपके माता पिता कौन हैं सो कहो ताकि आपका रहस्य भेद ज्ञात हो सके । दोनों संतों ने कहा कि ब्रह्म का विचार दूसरा कुछ नहीं, जिस ईश्‍वर का सारे संसार में विस्तार व्यापक है, हे विप्र वही हमारा इष्ट उपास्य देव है ॥४६॥ 
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ब्रह्म विचार सु विद्या कहिये, अविगत देव वह मंत्र लहिये । 
पांच पचीसों नेम सु लीया, तिनको लोभ तनिक नहीं दिया ॥४७॥ 
ब्रह्म का विचार करना ही हमारी विद्या है और अविगत देव परब्रह्म का जप स्मरण करना ही मंत्र है । पांच ज्ञानेन्द्रियों और रसगन्धादि विषयों का नियम से व्यवहार करना हमार नियम है । हम लोग इन इन्द्रियों और विषयों के लोभ में कभी नहीं पड़ते । यथावश्यक इनका उपयोग करते हैं ॥४७॥ 
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जत, सत, दया, व्रत यह राख्या, स्वामी दादू गुरु सु भाख्या । 
छिमां माता, सत्य सो पिता, कृपा कीन्ही आप विधाता ॥४८॥ 
इन्द्रिय दमन, सत्य, दया ये सब हमारे व्रत है जैसा कि स्वामी दादूजी ने हमें उपदेश दिया । क्षमा हमारी माता एवं सत्य हमारा पिता है । ईश्‍वर ने यह हमको देकर हम पर बहुत कृपा की है ॥४८॥ 
(क्रमशः)

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