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*आपै आप प्रकाशिया, निर्मल ज्ञान अनन्त ।*
*क्षीर नीर न्यारा किया, दादू भज भगवंत ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ सारग्राही का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*अरज भक्त भगवंत सौं, गरज१ करो गम२ होय ।*
*हरि गुरु हरि के आदि भृत३, जन राघव सुमरे सोय४ ॥७॥*
भगवान् और भक्तों से आवश्यकता१ के अनुसार मेरी प्रार्थना है । वे मुझ पर अनुग्रह करेंगे तब ही भक्तमाल लिखना रूप विशाल कार्य के करने में मेरी प्रगति२ हो सकती है । इस कार्य की निर्विघ्न पूर्णता के लिये मैं राघवदास हरि, गुरु और हरि के आदि सेवकों३ का स्मरण करता हूँ । कारण-इनका स्मरण है सोई४ इस कार्य को निर्विघ्न पूर्ण कराने वाला है ।
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*व्यापक ब्रह्माण्ड पचीस मधि, स्वर्ग मृत्यु पाताल ।*
*भक्तन हित प्रभु प्रकट हों, राघव राम दयाल ॥८॥*
पच्चीस तत्वों से रचित स्वर्ग, मृत्यु, पाताल लोक तथा संपूर्ण ब्रह्माण्ड में व्यापक प्रभु राम ऐसे दयालु हैं कि भक्तों के लिये तत्काल प्रकट हो जाते हैं ।
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*सत त्रेता द्वापर कलू, ये अनादि युग चार ।*
*राघव जे रत राम से, संत महंत उर धार ॥९॥*
सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि इन अनादि काल से चले आये चार युगों में जो भी रमता राम में अनुरक्त हुये हैं उन संत महंतों का अपने हृदय में ध्यान धरकर के मैं भक्तमाल लिखना आरंभ करता हूँ ।
(क्रमशः)

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