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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग विलावल २१(गायन समय प्रातः ६ से ९)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३५२ - (पँजाबी) **निज स्थान निर्णय उपदेश ।** एक ताल
अर्श१ इलाही२ रब्बदा३,
इथाँई४ रहमान५ वे ।
मक्का बिचि मुसाफरीला६,
मदीना मुल्तान वे ॥टेक॥
नबी८ नाल९ पैगम्बरे,
पीरों हँदा१० थान वे ।
जन तहुं ले हिकसा११ ला१२,
इथाँ बहिश्त१३ मुकाम वे ॥१॥
इथाँ आब१४ जमजमा१५,
इथाँई सुबहान१६ वे ।
तख्त रबानी१७ कंगुरेा१८,
इथाँई सु तान वे ॥२॥
सब इथाँ अँदर आव वे,
इथाई ईमान१९ वे ।
दादू आप७ वँजाइ२० बेा२१, इथाँई आसान वे ॥३॥
३५२ - ३५३ में निर्णय करके सँपूर्ण तीर्थादि रूप अपने आदि स्थान ब्रह्म की स्थिति का उपदेश कर रहे हैं, जगत् - पालक३ दयालु५ ईश्वरृ२ के रहने का सबसे ऊंचा स्वर्ग१(सहस्रारचक्र) यहां४ शरीर में ही है । यात्रा६ करने वालों के लिए, मक्का, मदीना और मुल्तान,
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ये ईश्वर - दूतों८ पैगम्बरों और पीरों के१० स्थान भी अपने साथ९(नाभि, हृदय, त्रिकुटी) शरीर के बीच में ही हैं । हे जन ! वृत्ति को सँसार दशा से ऊंची लेकर उक्त शरीरस्थ स्थानों में ही स्थिर करके एक११ परब्रह्म से ही लगा१२ । यही ब्रह्माकार वृत्तिजन्य जो सुख है, वही स्वर्ग१३ स्थान है ।
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अरब में स्थित मक्का नगर के काबे का जो "जम जम" नामक कूप१५(मुसलमानों का पवित्र तीर्थ) है, उसका पवित्र१६ जल१४ भी शरीर में ही(तालु मूल से टपक रहा) है । छोटे - छोटे शिखरों१८ जगत - पालक१७ ईश्वर का सिंहासन(अष्टदल कमल) भी शरीर में ही है । शरीर में ही बादशाह(मन) है । सब कुछ यहां शरीर में ही है । तुम सब प्रकार के अँहकार७ का त्याग२० करो, यही समय२१ अहँकार के त्यागने का है,
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फिर वृत्ति को अन्तर्मुख करके भीतर आओ शाँति प्रदान करने वाला(सत्य ईश्वर रूप) धर्म१९ मुहम्मद के वँश में मुहम्मद से १८ पीढ़ी पहले शिशु इस्मायल ने जन्म लेने के बाद माता की प्यास मिटाने के लिए एड़ियाँ घिसकर भूमि से जल निकाल लिया था । शरीर में ही है जिसे प्राप्त करना इस मानव शरीर में ही सुगम है । इस पद से निजामजी को उपदेश किया था ।
(क्रमशः)

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