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*ज्यों जाणों त्यों राखियो, तुम सिर डाली राइ ।*
*दूजा को देखूं नहीं, दादू अनत न जाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*वक्त ब्यौरा का अंग १२२*
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रज्जब दुख सुख देखिकर, कीजे नहीं उचाट१ ।
एक हु के पाइन पदम२, एक हु नहीं ललाट ॥१३॥
दुख सुख को देखकर मन को उदास१ न होने दो, वह तो कर्म की बात है, देखो, एक के चरण में कमल२-चिन्ह होता है वा पैरों में कमल चढाया जाता है वा पैर कमल-पुष्पों पर रहते हैं और एक के ललाट में भी चिन्ह नहीं होता और न चढाया जाता ।
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मारों लायक मार पाव हीं, मौजों लायक मौज ।
एक हु के पग कूकर काट ही, एक हु गैल सु फौज ॥१४॥
मार खाने योग्य होते हैं उन्हें मार मिलती है, आनन्द पाने योग्य होते हैं उन्हे आनन्द मिलता है । देखो, एक के तो पैरों को कुत्ते काटते हैं और एक के साथ सेना चलती है । यह सब अपने कर्मोंनुसार प्राप्त समय की बात है ।
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रज्जब सत जत सौं दीसे बड़ी, रति१ जु मस्तक मांहिं ।
रूप राग गुण सब थके, कोई पूजहिं२ नाँहिं ॥१५॥
सत्य पालन, ब्रह्मचर्य से मस्तक में महान शोभा१ भासती है, इस शोभा के आगे रूप, राग और गुण आदि की शोभा थक जाती है, उसे कोई भी नहीं पहुंचती२, अर्थात उसके समान नहीं हो सकती ।
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रती न पावै रती बिन, सती१ जती२ व्है जोय ।
सप्त द्वीप नौ खण्ड फिर, बिन रचना क्या होय ॥१६॥
सदगृहस्थ१ हो वा सन्यासी२ हो अपने पुरुषार्थ रूप रती के बिना एक रती भी वस्तु वा सुख नहीं मिलता । जम्बु द्वीप के नौं खण्डों में तथा सातों द्वीपों मे भी घूम फिर आवे तो भी अपने पुरुषार्थ द्वारा पुण्य रचना बिना सुख कैसे होगा ?
(क्रमशः)

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