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*निशिवासर मोहन तन मेरे, चरण कँवल मन जानै ।*
*निधि निरख देख सचु पाऊँ, दादू और न जानै ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ३४३)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*प्रथम प्रणम्य गुरु-पादुका, सब संतन शिर नाय ।*
*इष्ट अटल१ परमात्मा, परमेश्वर कृत२ गाय ॥५॥*
प्रथम प्रणाम करने योग्य गुरुदेव के चरणों की खड़ाओं को प्रणाम करके फिर भूत, भविष्यत्, और वर्तमान के सर्व सन्तों को शिर नमाकर प्रणाम करता हूँ तथा अपने इष्टदेव निश्चल१ परब्रह्म परमात्मा का ध्यान करके भक्तों के लिये किये२ हुये परमेश्वर के कार्यों का गायन करने में प्रवृत्त होता हूँ अर्थात् भक्तमाल लिखना आरंभ करता हूँ ।
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*विष्णु विरंचि शिव शेष जपि, जाती सती सिध सैण१ ।*
*वागी२ गणपति कविन को, चवैं३ चतुर विग४ वैण५ ॥६॥*
सृष्टि के रक्षक विष्णु भगवान्, सृष्टि रचने वाले ब्रह्मा, सृष्टि का संहार करने वाले शिव और विष्णु जी की शैया रूप परम भक्त शेषजी का नाम जप कर तथा शंकारचार्य आदि यति, हरिश्चन्द्र आदि सती, गोरक्ष आदि सिद्ध, कबीर आदि संत१ सरस्वती२, गणपति, वाल्मीकि और व्यासादि कवि, तथा ज्ञानमय वचनों५ को प्रदान३ करने वाले चतुर विज्ञों४(विद्वानों) को प्रणाम करता हूँ, उक्त सभी मुझ पर अनुग्रह अवश्य करेंगे ही ।
(क्रमशः)

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