बुधवार, 26 अगस्त 2020

*५. परचा कौ अंग ~ ३२५/२८*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*५. परचा कौ अंग ~ ३२५/२८*
कहि जगजीवन रांमजी, तेज पुंज हरि सेज । 
अंगि मांहि सब अंग दिखावै, जीव सीव८ करि तेज ॥३२५॥ 
{८. सीव-शिव (=मंगलमय)} 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि तेज पुंज ही तेजोमय प्रभु का आसन है, वे अपने भीतर ही सब दिखाते हैं और जीव का मंगल या शिव प्रतीक सुन्दर होता है । 
तेज तेज मिलि हरि हरि, तेज तेज मिलि वोढ़ि९ । 
कहि जगजिवन तेज सुख, तेज तेज के गोढ़ि१० ॥३२६॥ 
(९. वोढ़ि-ओढ़ना) {१०. गोढ़ि-आलम्बन(=सहारा)} 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि तेज युक्त प्रभु भी तेज स्वरूप हैं । और उनका आवरण या वस्त्र भी तेज है । कहते हैं इस प्रकार तेज का सुखालम्ब भी तेज है । 
पूत पिता की गोद मंहि, लाड करै बिन लाछि१ । 
कहि जगजीवन मेर मथि, तत्त गहै तजि छाछि२ ॥३२७॥ 
(१. लाछि-प्राप्ति की इच्छा) {२. छाछि-निस्सार वस्तु(=घी निकाला हुआ मट्ठा)} 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पिता की गोद में पुत्र बिना किसी शर्त के स्नेह निमग्न होता है । यह उसी प्रकार है जैसै दही मथ कर मक्खन ग्रहण कर छाछ छोड़ दी जाय । 
ब्रह्म तेज मंहि ब्रह्म है, सबद तेज मंहि साखि । 
कहि जगजीवन ग्यांन मंहि, रहि विग्यांन रस राखि ॥३२८॥ 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि ब्रह्म तेज में ब्रह्म है । शब्द के प्रभाव से साखी निर्माण और ज्ञान में विज्ञान अर्थात तथ्य रहते हैं ।
(क्रमशः)

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