बुधवार, 26 अगस्त 2020

*(“तृतीयोल्लास” ३१/३३)*

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
*(“तृतीयोल्लास” ३१/३३)* 
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सूत्र मेरो ऐसे प्रकासू, है नजीकि आरणि में वासू । 
दलबल लेइ चढयो सब राई, दीवान मुसद्दी दुनी सवाई ॥३१॥ 
विप्र ने कहा कि उन संतों का वास यहां नजदीक ही जंगल में है । विप्र के कहने से राजा ने दलबल के साथ उस जंगल पर चढाई कर दी मुसद्दी दिवान आदि भी साथ थे ॥३१॥ 
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*संतों ने मृग का रुप बनाया*
धूम धूम होती आई, तबै कछु संतों सुधि पाई । 
तब इक पलटी संतनि काया, छाड़ी देह कुरंग है आया ॥३२॥ 
राजा व अन्य लोग जंगल में घूमने लगे तो संतों ने समझ लिया कि यहां राजा आदि आये हैं ऐसा संतों को ज्ञान हुआ । तब साधों ने अपनी काया पलट कर अपनी देह छोड़ कर हिरण के रूप में होकर राजा के सामने आये ॥३२॥ 
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चहुं दिसा को ढूंढत डोलै, कोई चुप कोई भारी बाले । 
और कछु सहिनाण न पाया, दोऊ कुरंग तवै दरसाया ॥३३॥ 
राजा और उसके सैनिक चारों दिशाओं में संतों को ढूंढने लगे कोई जोर से बोलकर ढूंढता और कोई चुपचाप ढूंढता । उन लोगों को संतों का कोई भी चिन्ह निशान नहीं मिला । केवल दो हिरण उनको दिखाई दिये ॥३३॥
(क्रमशः)

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